तीन वर्षीय आदि के जीवन की किताब का महत्वपूर्ण अध्याय — अलग तरह का प्रि-स्कूल

तीन फरवरी 2020 से आदि के जीवन का नया अध्याय शुरू हो रहा है। तीन वर्ष के हो चुके आदि प्रि-स्कूल जाना शुरू करेंगे। प्रि-स्कूल नाम से यह गलतफहमी हो सकती है कि यह प्राइमरी कक्षाओं के पहले की स्कूलिंग की तैयारी जैसा कुछ है जहां शिक्षक छात्रों को कुछ पढ़ना लिखना सिखाएंगे, बच्चा किताब कापी लेकर प्रि-स्कूल जाएगा। जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा भले ही इसे प्रि-स्कूल कहा जाता है। आदि किसी भी प्रकार की पतली मोटी, बड़ी छोटी, चौड़ी कोई भी किताब या कापी या पेन पेंसिल लेकर प्रि-स्कूल नहीं जाएंगे।

आदि के लिए खाना व पानी व खिलौने इत्यादि ले जाने के लिए एक खूबसूरत विशेष बैग ले लिया गया है। इस बैग में एक चैंबर ऐसा भी है, जो इंसुलेटेड है, तापमान संरक्षित रखता है। सैलीन वाटर से भरे दो पतले कंटेनर भी ले लिए गए हैं। सैलीन वाटर सामान्य पानी की तुलना में अधिक तापमान पर भी जम जाता है। इन कंटेनर्स को इंसुलेटेड चैंबर में रख देने से चैंबर कई घंटों तक ठंडा बना रहता है। इसका लाभ यह है कि आदि प्रि-स्कूल में अपने खाने के लिए जो भी फल, सब्जी इत्यादि ले जाएंगे, खराब नहीं होंगे। बैग इसी प्रयोजन के लिए है। आदि अपने इस बैग में अपना सामान कैसे सजाते हैं, इस संदर्भ में वीडियो इस लेख के सबसे अंत में दिया गया है, वहां देखा जा सकता है।


अहर्ता

  • ऑस्ट्रेलिया में शैक्षणिक सत्र फरवरी से शुरू होते हैं, बच्चे का सत्र प्रारंभ होने से पहले कम से कम तीन वर्ष की आयु का होना।
  • बच्चा शौच व पेशाब करने में स्वावलंबी हो। अपने कपड़े उतारने, टायलेट पर बैठने, फ्लश करना, अपने अंगों की सफाई करने, साबुन से हाथ धोने, हाथ पोछने तथा कपड़े फिर से पहनने इत्यादि-इत्यादि अपने आप कर लेता हो।
  • बच्चे के माता पिता या अभिभावक शैक्षिक प्रयोगों पर विश्वास करते हों तथा शिक्षा को किताबें रटने व रटे हुए की उल्टी करने को इंटेलीजेंस इत्यादि मानने की बजाय स्वयं देखने व करते हुए सीखने समझने को मानते हों।

कक्षा (क्लासरूम)

बंद क्लासरूम जैसा कुछ नहीं। यदि भवन को ही कक्षा के रूप में परिभाषित करना हो तो बच्चों के लिए दो बड़े कमरे हैं, जिनमें इनडोर खेलने का सामान रहता है, दोपहर में बच्चे सोते हैं, बच्चों के लिए विशेष ऊंचाई वाले टायलेट हैं। खेलते हुए सीखने के विभिन्न प्रकार के खिलौने इत्यादि तामझाम, बच्चों के लिए छोटे-मोटे शहर जैसा। जब बाहर का वातावरणीय मौसम बच्चों के लिए उचित नहीं होता तब कमरों के अंदर रहना होता है। वैसे इनको कमरे कहना भी सही नहीं है, क्योंकि इन कमरों के अंदर होते हुए भी कमरे जैसा अहसास नहीं होता है।

वास्तविक क्लासरूम तो खुले आसमान के नीचे लगते हैं, वह भी जिस बच्चे को जो गतिविधि करने की इच्छा हो। बच्चा अपने लिए क्लासरूम का आकार प्रकार विषय व समयावधि स्वयं तय करता है।

कुछ-कुछ दिनों में नई-नई गतिविधियों के लिए बदलाव होते रहते हैं। क्या बदलवा होने चाहिए, किस गतिविधि से बच्चा के लिए क्या सीखने की संभावनाएं हो सकती हैं, इस पर शिक्षक मंत्रणाएं करते हैं, बच्चों से भी सहमति ली जाती है, उनके भी आइडियाज को महत्व दिया जाता है।

कृषि, जैविक खाद, बागवानी, तालाब, पानी, रसोई व सफाई व अन्य घरेलू कामकाज, यातायात के नियम, भवन निर्माण इत्यादि, यांत्रिक वैज्ञानिक व तकनीकी गतिविधियां, खेलकूद इत्यादि प्रकार की विभिन्न प्रकार की खुली कक्षाएं।

शिक्षक

शिक्षक व बच्चों की संख्या का अनुपात लगभग सात/आठ है। हर सात/आठ बच्चे पर एक शिक्षक। शिक्षक ऐसे जिनको बच्चों के साथ काम करने में आनंद आता है, न कि वेतन पाने के लिए बेमन से नौकरी करने वाले लोग।

शिक्षक व बच्चों का रिश्ता ऐसा कि शिक्षक प्रि-स्कूल कैंपस में होते हुए भी, बच्चों को लगातार ऑब्जर्व करते हुए भी कुछ इस तरह से रहते हैं कि बच्चे शिक्षकों पर निर्भरता महसूस नहीं करते हैं। बच्चों को अपने आधार पर देखने, जानने, समझने, प्रयोग करने का वातावरण उपलब्ध कराया जाता है।

जब भी जिस बच्चे को शिक्षक की जरूरत होती है तो शिक्षक सहजता व सरलता से मित्र की तरह उपलब्ध रहते हैं। बच्चे को जितनी जरूरत है, उतना ही उपलब्ध होते हैं। अपने आपको विद्वान मानकर बच्चों पर थोपने, लादने, उनकी सहज जिज्ञासा को हतोत्साहित करने, प्रयोगशीलता को हतोत्साहित करने की बजाय उनको भविष्य में समाज को बच्चों द्वारा उनका सबसे बेहतरीन दे पाने के लिए सक्षम बनाने को जिम्मेदारी की तरह महसूस करते हुए बच्चों के साथ मित्रवत रहना।

शिक्षकों के साथ बच्चों को ऐसा लगता है कि शिक्षक भी उन्हीं की तरह बच्चे हैं जो उनके साथ ही उन्हीं की तरह करते हुए जानने समझने सीखने का प्रयास कर रहे हैं। शिक्षक ऐसा सहज भाव से करते हैं न कि बच्चों को दिखाने के लिए ढोंग। यही कारण है कि घंटों रोज बच्चों के साथ लगातार सक्रिय रहने के बावजूद शिक्षक अपना आपा नहीं खोते हैं, खीझते नहीं हैं, अपने आपको थका हुआ नहीं महसूस करते हैं, चेहरे व भाव पर शिकन नहीं आती है। शिक्षक व बच्चे अंदर की खुशी से मुस्कुराते रहते हैं। यह बच्चे व शिक्षक के मध्य विश्वसनीय रिश्ते की सबसे मूल खासियत है। दबाव, ढोंग व दिखावा रहित संबंध। अपने अनुसार बच्चों को चलाने की मानसिकता नहीं, वरन् बच्चों की विशिष्टता का आदर करते हुए चलना।

चित्रों को देखकर समझा जा सकता है कि बच्चे अपनी गतिविधियां स्वयं करते हैं। शिक्षक उनके सर पर खड़े नहीं रहते हैं, बात-बात पर दिशा निर्देश नहीं देते रहते हैं, बच्चों को नियंत्रित नहीं करते हैं। बच्चे अपनी स्वतंत्रता के साथ अपनी कल्पनाशीलता के आधार पर अपनी गतिविधियां व प्रयोग कर सकें इसलिए बच्चों को स्वतंत्रता दी जाती है। चित्रों में शिक्षक शायद ही कहीं दीख रहे हों, ऐसा नहीं है कि मैंने इन चित्रों को ऐसे खींचा है कि शिक्षक न दिखाई पड़ रहे हों। चित्रों को देखिए, स्पष्ट होगा कि चित्रों की जद से शिक्षकों को बाहर रखने का प्रयास नहीं किया गया है।

चित्र (21 फोटो)

वीडियो

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