बिहार की शिक्षा व्यवस्था का भयावह यथार्थ : एक राष्ट्रव्यापी चुनौती
बिहार राज्य की शिक्षा व्यवस्था आज जिस भयावह और चिंताजनक स्थिति में पहुँच चुकी है, उसकी कल्पना करना भी असंभव है। यह केवल एक राज्य की आंतरिक समस्या नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के भविष्य को प्रभावित करने वाली एक गंभीर चुनौती है। मैं जो कड़वा यथार्थ आपके समक्ष प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, उस पर विश्वास कर पाना शायद मुश्किल होगा, क्योंकि यह किसी अतिशयोक्तिपूर्ण कथा जैसा लग सकता है, पर यह बिहार की शिक्षा प्रणाली का कटु सत्य है, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। यहाँ की शिक्षा व्यवस्था इतनी खोखली हो चुकी है कि इसका मूल उद्देश्य ही समाप्त हो गया है। शिक्षा, जो किसी भी समाज की नींव होती है, यहाँ सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गई है, जिससे आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। यह स्थिति न केवल व्यक्तिगत आकांक्षाओं को कुचलती है, बल्कि राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास को भी गंभीर रूप से बाधित करती है। यह केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम बनकर रह गई है, जहाँ ज्ञान और कौशल गौण हो गए हैं।
ज्ञानविहीन डिग्री और खोखली शिक्षा:
इस प्रणाली का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पूरे वर्ष में बिना एक भी दिन स्कूल या कॉलेज जाकर कक्षा में पढ़े, यहाँ तक कि घर में भी बिना एक दिन पढ़ाई किए, बिना एक दिन भी प्रयोगशाला में कोई प्रयोग किए, छात्र आसानी से डिग्री प्राप्त कर लेते हैं। यह प्रणाली छात्रों को बिना किसी वास्तविक ज्ञान, समझ या व्यावहारिक कौशल के शैक्षणिक उपाधियाँ प्रदान कर रही है, जिससे शिक्षा का अर्थ ही बदल गया है। छात्र उपाधियों के कागजी टुकड़े तो हासिल कर लेते हैं, लेकिन उनके पास न तो किसी विषय का ज्ञान होता है और न ही किसी क्षेत्र में आवश्यक व्यावहारिक कौशल। यह स्थिति युवाओं को एक ऐसे भविष्य की ओर धकेल रही है जहाँ उनके पास कागजी डिग्रियाँ तो होंगी, लेकिन योग्यता का अभाव होगा। यह एक अदृश्य अभिशाप है जो युवाओं की क्षमताओं को कुचल रहा है और उन्हें वास्तविक दुनिया की चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ बना रहा है। इस “ज्ञानविहीन डिग्री” का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, जिससे कार्यबल की गुणवत्ता गिरती है और नवाचार व उत्पादकता में कमी आती है। यह सिर्फ एक व्यक्ति, समाज, राज्य की समस्या नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र और व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत ही अधिक भयावह खतरा है।
परीक्षाओं का पाखंड और भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा:
यदि मैं यह कहूँ कि यहाँ परीक्षाओं में भी बिना परीक्षा कक्ष में उपस्थित हुए, बिना परीक्षा में एक भी शब्द लिखे, सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया जा सकता है, तो शायद यह और भी अविश्वसनीय लगेगा, लेकिन यह पूरी तरह से सच है। यह स्थिति शिक्षा प्रणाली में व्याप्त भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा को दर्शाती है। छात्र स्कूल/कॉलेज प्रशासन को अतिरिक्त पैसा देकर पूरी तरह अनुपस्थित रह सकते हैं।
वर्ष भर में एक दिन भी कक्षा में उपस्थित न होने के बावजूद, उनके अटेंडेंस रजिस्टर में 90% से अधिक उपस्थिति चढ़ा दी जाती है, मानो वे सबसे मेहनती छात्र हों। यह धोखाधड़ी न केवल अयोग्य छात्रों को गलत तरीके से लाभ पहुँचाती है, बल्कि मेहनती और ईमानदार छात्रों के साथ भी घोर अन्याय करती है। इससे उन छात्रों का मनोबल टूटता है जो अपनी मेहनत और लगन से आगे बढ़ना चाहते हैं, और उन्हें लगता है कि ईमानदारी का कोई मूल्य नहीं है। यह स्थिति शिक्षा की मूलभूत पवित्रता व आधार पर प्रश्नचिह्न लगाती है, जिससे पूरे शैक्षिक ढांचे की विश्वसनीयता खतरे में पड़ जाती है। यह एक नैतिक पतन है जो छात्रों को गलत संदेश देता है कि सफलता के लिए ईमानदारी की आवश्यकता नहीं है, बल्कि ‘सेटिंग‘ और पैसे से सब कुछ हासिल किया जा सकता है।
परीक्षा केंद्रों पर धाँधली का खुला खेल: शिक्षा और समाज का पतन:
परीक्षा केंद्रों पर तो भ्रष्टाचार का एक खुला खेल चलता है। परीक्षा केंद्रों के संचालकों को पैसा देकर छात्र जमकर नकल कर सकते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि परीक्षा कक्ष–निरीक्षक स्वयं छात्रों को नकल कराते हैं, मानो यह उनका कर्तव्य हो या वे इसमें अपनी सहभागिता को एक प्रतिबद्ध सामाजिक प्रक्रिया मानते हों। यदि कोई छात्र परीक्षा कक्ष में नहीं जाना चाहता, तो उसे अतिरिक्त पैसा देना होता है, और उसके स्थान पर कोई दूसरा व्यक्ति परीक्षा दे देता है।
स्थिति इतनी भयावह है कि परीक्षा संचालन करने वाली अथॉरिटी के लोगों से संपर्क करके, पैसे देकर अंक भी प्राप्त किए जा सकते हैं। इस तरह की भ्रष्ट अनियमितताएँ पूरी शिक्षा प्रणाली को भीतर से खोखला कर चुकी हैं, परीक्षाओं की शुचिता और विश्वसनीयता पूरी तरह समाप्त हो गई है। यह एक ऐसा सार्वजनिक रहस्य है जिसे सभी जानते हैं, लेकिन कोई इस पर अंकुश लगाने का प्रयास नहीं करता, उल्टे चाहते हैं कि ऐसी स्थितियां बनीं रहें। यह स्थिति शिक्षा का मज़ाक बनाती है और योग्य छात्रों के भविष्य को अंधकारमय करती है। यह केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सामाजिक पतन है जो ईमानदारी और नैतिकता के मूल्यों को नष्ट कर रहा है, और आने वाली पीढ़ियों को भी यही संदेश दे रहा है।
ज्ञान का अभाव और उच्च अंकों का विरोधाभास: एक विडंबनापूर्ण वास्तविकता
यह एक गंभीर विडंबना ही है कि जिन छात्रों को यह भी नहीं पता कि न्यूटन कौन थे, जिन्हें बल की परिभाषा तक नहीं आती, ऐसे लोग विज्ञान जैसे विषयों में भी 90% से अधिक अंक प्राप्त कर लेते हैं। और यह सब बिना स्कूल जाए, बिना प्रयोगशाला में कोई प्रयोग किए, और बिना परीक्षा केंद्र में जाकर परीक्षा दिए होता है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि अंक प्राप्त करना, डिग्री प्राप्त करना, ज्ञान प्राप्त करने से कहीं बहुत ही अधिक आसान है, और इसमें केवल धन और भ्रष्टाचार का अनैतिक व असामाजिक खेल चलता है।
यह स्थिति शिक्षा के वास्तविक मूल्य को खत्म कर रही है, और छात्रों को केवल डिग्री बटोरने की होड़ में धकेल रही है, जिससे उनके अंदर मौलिक समझ और रचनात्मकता का विकास बाधित होता है। यह एक ऐसी विडंबनापूर्ण वास्तविकता है जो समाज के बौद्धिक ताने–बाने को कमजोर कर रही है और भविष्य की पीढ़ियों को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है। ऐसे छात्र जब वास्तविक उच्च शिक्षा या नौकरी में प्रवेश करते हैं, तो वे अपनी अयोग्यता के कारण जिम्मेदार व जवाबदेह नहीं हो पाते, जिससे व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों स्तरों पर निराशा और कुंठा फैलती है। वे उन योग्य छात्रों की जगह ले लेते हैं जो वास्तव में मेहनत करते हैं, जिससे एक अन्यायपूर्ण वातावरण बनता है।
उच्च शिक्षा में भ्रष्टाचार की गहरी जड़ें: राष्ट्र की नींव को ध्वस्त करना
शिक्षा भ्रष्टाचार की जड़ें उच्च शिक्षा में भी बहुत गहरी हैं। जिन लोगों को रिसर्च का ‘क‘ भी नहीं पता, वे लोग आसानी से PhD की डिग्री प्राप्त करके विश्वविद्यालयों और उच्चशिक्षा के संस्थानों में प्रोफेसर बन जाते हैं।
यहां तक कि राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों से भी इन्हीं तौर–तरीकों से PhD प्राप्त करने वाले बहुत लोग हैं। यह स्थिति न केवल शिक्षा के स्तर को गिराती है, बल्कि भावी पीढ़ियों के लिए भी घातक है, क्योंकि उन्हें ऐसे शिक्षकों से शिक्षा मिलती है, जिनके पास स्वयं मौलिक ज्ञान और शोध का अनुभव–अभाव होता है। ऐसे अयोग्य प्रोफेसर छात्रों को सही मार्गदर्शन नहीं दे पाते, जिससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता लगातार गिरती जा रही है। इसके दीर्घकालिक परिणाम अत्यंत भयावह होते जा रहे हैं, क्योंकि इससे अनुसंधान और नवाचार की क्षमता कम होती है, जो किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। यह स्थिति समाज को ज्ञान–आधारित अर्थव्यवस्था में पिछाड़ती है, और प्रतिभाओं को पलायन करने पर मजबूर करती है।
सरकारी नौकरियों में भी ‘सेटिंग्स‘:
इसी तरह की ‘सेटिंग्स‘ सरकारी नौकरियों के लिए होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में भी होती है। डिग्री लेने से लेकर सरकारी नौकरी प्राप्त करने तक, हर स्तर पर यही ‘सेटिंग्स‘ व्याप्त हैं। भ्रष्टाचार इस कदर फैल चुका है कि शिक्षा के हर स्तर पर यही स्थिति बनी हुई है। यह योग्यता का तिरस्कार है, जहाँ परिश्रम और प्रतिभा के स्थान पर पैसे और संबंधों का बोलबाला है। यह स्थिति योग्य और मेहनती युवाओं को हताश करती है, उन्हें लगता है कि उनके पास अवसर नहीं हैं, जिससे सामाजिक असंतोष, अपराध, व हिंसा इत्यादि बढ़ते हैं। यह एक ऐसा दुष्चक्र है जो समाज के विकास को बाधित करता है, और युवाओं के भविष्य को अंधकारमय बना रहा है। इस व्यवस्था को बदलने के लिए एक कठोर और ईमानदार प्रयास की तत्काल आवश्यकता है। यदि इस स्थिति को नहीं सुधारा गया, तो समाज का सामाजिक ताना–बाना और भी कमज़ोर होगा, जिससे अस्थिरता और पिछड़ापन भयावह स्थिति की ओर बढ़ता रहेगा। यह केवल एक राज्य का मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चिंता का विषय है, क्योंकि एक समृद्ध भारत के लिए सभी राज्यों का शिक्षित व कुशल होना अनिवार्य है।
October 1, 2025 @ 12:05 pm
“विवेक उमराव सर, आपका यह लेख शिक्षा व्यवस्था की खोखली नींव पर गहरी चोट करता है। आपने जिस संवेदनशीलता और ईमानदारी से इस समस्या को शब्द दिए हैं, वह काबिल-ए-तारीफ है। यह केवल बिहार ही नहीं बल्कि पूरे राष्ट्र की चुनौती है। शिक्षा का स्तर यदि इसी प्रकार गिरता रहा तो आने वाली पीढ़ियाँ अंधकार की ओर चली जाएंगी। आपके विचार हमें इस दिशा में सुधार की आवश्यकता का अहसास कराते हैं। “सर, आपकी लेखनी समाज के दर्द को आवाज देती है। शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता को आपने जिस स्पष्टता और गहराई से प्रस्तुत किया है, वह अद्वितीय है। यह लेख न केवल छात्रों बल्कि अभिभावकों, शिक्षकों और नीति-निर्माताओं सभी को आत्ममंथन करने पर विवश करता है। आपका यह प्रयास निश्चित ही समाज को सही दिशा देने वाला साबित होगा।आपका यह प्रयास प्रशंसनीय और प्रेरणादायक है। समाज और व्यवस्था को जागरूक करने में ऐसे लेखों की बड़ी भूमिका होती है।
October 2, 2025 @ 2:45 am
True depiction of the deplorable state of our education system, particularly the higher education which has become a scam. An organised racket for obtaining high marks without studying and receiving PhD without doing any original research.
October 2, 2025 @ 2:48 am
High time we woke up to the malaise affecting our education system that is gnawing at the root of our society and economy. Higher education has become a well-oiled machinery for obtaining degrees without studying.