COVID-19 “प्रलय” बनाम भारतीय समाज : भयावह गलतियां, सैडिज्म व मूर्खता
मैंने पिछले वर्ष मतलब एक वर्ष से भी अधिक (13-14 महीने) पहले समय में Covid-19 के संदर्भ में अनेक लेख व पोस्टें लिखीं थीं। कुछ चंद अपवाद लोगों को छोड़कर अधिकतर लोगों को तब मेरी बातें मजाक लगतीं थीं, भले ही खुलकर कहते हों या नहीं कहते हों, लेकिन मेरी बातों को गंभीरता से नहीं लेते थे। बहुत लोग बिना मुद्दे की गहराई व गंभीरता को समझे हुए सतहीपन व खोखलेपन के कारण गाली गलौच /तिरस्कार तक करते थे।
किंतु इस वर्ष 2021 की Covid-19 की लहर महसूस करने व झेलने के बाद शायद कुछ लोगों को Covid-19 के संदर्भ में ऑब्जेक्टिविटी के साथ कुछ बातें पढ़ने सुनने इत्यादि में रुचि हो। इसलिए Covid-19 से संबंधित कई मुद्दों पर आधारित यह लेख लिख रहा हूं।
Covid-19 वायरस
उत्परिवर्ती प्रकार (mutant variants)
चिकित्सा-विज्ञान की बहुत अधिक तकनीकी शब्दावली के तामझाम से इतर यदि आम-व्यक्ति की भाषा में कहा जाए तो Covid-19 वायरस एक बहुत ही अधिक स्मार्ट वायरस है। इतना अधिक स्मार्ट वायरस है कि भले ही लोग संक्रमित होने के बाद ठीक होते रहें या बिना लक्षणों के ही संक्रमित होते हों या जिन लोगों पर हल्का असर हुआ उन लोगों को यह लगे कि उनका शरीर इतना मजबूत है या उनमें इम्युनिटी बहुत अधिक है इसलिए यह वायरस उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाया।
लेकिन यदि लक्षण या बिना लक्षण किसी भी प्रकार से संक्रमित लोगों के कारण यह वायरस एक शरीर से दूसरे शरीर में पहुंचता रहता है, यानि यदि यह वायरस एक शरीर से दूसरे शरीर में पहुंचने का जरिया प्राप्त करता रहता है तो लोगों के शरीर की आंतरिक व्यवस्था, संरचना व इम्युनिटी तंत्र इत्यादि को समझते हुए अधिक खतरनाक हो पाने के लिए Covid-19 वायरस अपना म्यूटेशन करने की प्रक्रिया में लगा रहता है। यही कारण है कि इस वायरस का अगला संस्करण मतलब उत्परिवर्ती प्रकार (mutant variant) पिछले संस्करण की तुलना में बहुत अधिक खतरनाक होता है। यही प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है और विभिन्न सामाजिक समूहों मतलब "एथनिसिटी" (ethnicity), sub-ethnicity, खानपान की विभिन्नता, जीवनशैली की विभिन्नता इत्यादि के आधार पर यह वायरस अपना म्यूटेशन करते हुए और अधिक खतरनाक होता रहता है।
म्यूटेशन रोकने के लिए Covid-19 वायरस का एक शरीर से दूसरे शरीर में संवहन को रोकना होता है। बिना संवहन को रोके, म्यूटेशन को नहीं रोका जा सकता है। यदि इस वायरस का म्यूटेशन नहीं रोका जा सकता है तो हर्ड-इम्युनिटी कतई संभव नहीं, वैक्सीन-बूस्टर्स की जरूरत पड़ती रहेगी वह भी एक तरह से बिलकुल नई वैक्सीन के जैसे बूस्टर्स।
लोगों को धोखा देने, मूर्ख बनाने के लिए प्रचार-प्रसार व प्रोपागंडा चाहे जो किए जाएं लेकिन जो वैक्सीन मुर्दा वायरस से बनाने जैसी बहुत पुरानी तकनीक से बनाई जा रही हैं, Covid-19 वायरस के लिए बनाई जाने वाली ऐसी वैक्सीनों का कोई खास मतलब है ही नहीं। विकास करते-करते वर्तमान में जहां तक हमारा विज्ञान पहुंच चुका है, उसके आधार पर आधुनिक तकनीक से बनी वैक्सीन भी एक सीमा से अधिक सुरक्षा कर पाने में समर्थ नहीं हो पाएगी, भविष्य में हमारा वैज्ञानिक क्षमता और बढ़ जाए और हम और अधिक बेहतर तकनीकें खोज निकालें तो बात अलग है।
टेस्टिंग व ट्रेसिंग सबसे जरूरी
Covid-19 वायरस का संक्रमण व्यक्ति से व्यक्ति, व्यक्ति से वस्तु, वस्तु से व्यक्ति फैलता है। व्यक्ति से व्यक्ति फैलने का यह मतलब नहीं कि कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को छुए ही। अलग-अलग धातुओं पर Covid-19 वायरस के जीवित रहने की आयु अलग-अलग होती है। इसलिए यदि किसी वस्तु को Covid-19 संक्रमित व्यक्ति ने छुआ या प्रयोग किया है तो उस वस्तु पर Covid-19 वायरस आ सकता है, अब यदि उस वस्तु को कोई अन्य व्यक्ति छूता है या प्रयोग करता है तो वह व्यक्ति Covid-19 वायरस से संक्रमित हो सकता है।
इसी प्रकार यदि कोई संक्रमित व्यक्ति छींकता है, खांसता है या जम्हाई लेता है या बात करता है या मुंह खोलता है तो निकलने वाली वायु इत्यादि के माध्यम से Covid-19 दूसरे व्यक्ति तक पहुंच जाता है। इसीलिए जिन लोगों को संक्रमण है, वे लोग जब तक Covid-19 के वायरस संक्रमण से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो जाते हैं तब तक उनको दूसरे लोगों से पूरी तरह से आइसोलेट होना चाहिए। आइसोलेशन कैसे होना चाहिए, इसके लिए जागरूकता फैलाने की बहुत अधिक जरूरत है। भारत जैसे देशों में तो अपवाद लोगों को छोड़कर किसी को पता ही नहीं कि आइसोलेशन कैसा होना चाहिए, आइसोलेशन में किस तरह रहना चाहिए।
पूरी तरह से संक्रमण मुक्त होने का मतलब, रिपोर्ट निगेटिव आने के बावजूद यह वायरस लोगों के शरीर में सूक्ष्म रूप में विद्यमान रहता है, इस सूक्ष्म रूप की उपस्थिति को भी उस सीमा तक खतम करना ताकि यह वायरस किसी अन्य के शरीर को संक्रमित कर पाना तो दूर संवहन तक नहीं कर पाए। ताकि वायरस का संवहन नहीं हो सके, म्यूटेशन नहीं हो सके।
संक्रमित व्यक्ति का मतलब वे व्यक्ति भी जो संक्रमित तो हैं लेकिन उनमें कोई लक्षण नहीं दीखते हैं, उनको लगता है कि वे बीमार नहीं हैं। संक्रमित व्यक्ति पर Covid-19 वायरस ने बिना लक्षण वाला या हलका या तगड़ा या अतिगंभीर किस प्रकार का हमला किया है, इस आधार पर चिकित्सा करके वायरस से मुक्त होने में मदद करना।
संवहन रोकने के लिए, संक्रमण रोकने के लिए, Covid-19 वायरस का म्यूटेशन रोकने के लिए हर एक संक्रमित व्यक्ति का पता लगाना। ऐसा कर पाना बिना गंभीर ट्रेसिंग व टेस्टिंग के संभव नहीं। ट्रेसिंग व टेस्टिंग Covid-19 वायरस को रोकने के लिए सबसे मूल, सबसे जरूरी व सबसे महत्वपूर्ण हैं। बिना इनके आकड़ों की बाजीगरी चाहे जो की जाए, इस वायरस से लोगों को सुरक्षित कर पाना कतई संभव नहीं।
संक्रमण व मृत्यु आकड़ों की बाजीगरी
भारत में बिना ट्रेसिंग किए ही महीनों-महीनों तक घोषणा की जाती रही कि कम्युनिटी ट्रांसमिशन नहीं हो रहा है, जबकि असलियत यह रही कि भारत में कम्युनिटी ट्रांसमिशन फरवरी 2020 की शुरुआत में या उससे भी पहले से ही शुरू हो चुका था। यह बहुत बड़े स्तर पर हुए कम्युनिटी ट्रांसमिशन का ही नतीजा है कि भारत में Covid-19 वायरस ने अपना म्यूटेशन किया, आगे भी करता रहेगा। भारत में भयंकर रूप से व्याप्त कम्युनिटी ट्रांसमिशन का ही परिणाम है कि Covid-19 वायरस ने म्यूटेशन के बाद जो वर्तमान संस्करण बनाया है वह देश भर में बहुत तेजी से फैलते हुए करोड़ों लोगों को संक्रमित किया है, लाखों लोगों को अकाल मृत्यु प्राप्त करने के लिए मजबूर किया है।
जितनी व जिस तरह की टेस्टिंग भारत में होनी चाहिए थी उसका बहुत छोटा सा अंश भी कभी नहीं हुई, न हो रही है। बिना टेस्टिंग हुए मोबाइल वाले कोविड-एप्लिकेशन का कोई मतलब नहीं रह जाता है। केवल दिखावटी वस्तु बन कर रह जाती है। कोई वाजिब कारण हो ही नहीं सकता, शायद आकड़े कम दिखाने के लिए टेस्टिंग कम की जाती रही, जितनी भी टेस्टिंग की जाती रही वह बहुत ही अधिक अव्यवस्थित तरीके से की जाती रही कि टेस्टिंग के मायने ही नहीं रह जाते हैं।
यहां तक कि आम लोगों को जागरूक करने की बजाय, उनकी अजागरूकता का दोहन करते हुए थर्मल स्क्रीनिंग को Covid-19 के संक्रमण की टेस्टिंग के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता रहा। थर्मल स्क्रीनिंग को Covid-19 टेस्टिंग करना बता कर वाहवाही भी लूटी जाती रही, राज्य व राष्ट्र स्तर पर पुरस्कारों का लेनदेन भी होता रहा। देश के लोगों को लगता रहा कि सबकुछ ठीक चल रहा है, वे सुरक्षित हैं, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। जबकि जो टेस्टिंग हो भी रहीं थीं उनके आकड़ों में भी मैनिपुलेशन किया जाता रहा।
मान लीजिए कि कोई देश टेस्टिंग बहुत ही कम कर रहा है या व्यापक स्तर पर टेस्टिंग करने की बजाय उन्हीं लोगों की ही टेस्टिंग बार-बार कर रहा है तो उस देश के आकड़े बहुत ही कम आएंगे भले ही उस देश में लाखों करोड़ों Covid-19 केस हर रोज बढ़ रहे हों, हजारों लाखों लोगों की मौतें इस वायरस से प्रतिदिन हो रही हों।
दुनिया व देश के लोगों को यदि आकड़ों में संक्रमित लोगों व मृत्यु की संख्या अधिक दिख जाने से कौन सा पहाड़ टूट जाना है, उल्टे देश के लोग Covid-19 को गंभीरता से लेना शुरू करेंगे, बचाव करना शुरू करेंगे। दुनिया के देश सहयोग के लिए आगे आएंगे। आकड़ों की बाजीगरी से देश के लोगों का जीवन तो नहीं सुरक्षित हो जाएगा, उल्टे लोगों के जीवन की सुरक्षा पर खतरा बढ़ना ही है।
हमारी प्राथमिकता सिर्फ और सिर्फ होनी चाहिए Covid-19 वायरस के म्यूटेशन को रोकने की। यह सिर्फ और सिर्फ धुआंधार व व्यवस्थित टेस्टिंग और वायरस के एक शरीर से दूसरे शरीर में संवहन को रोकने से ही हो सकता है। देश में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं होना चाहिए जो कोरोना संक्रमित हो और वह किसी भी चूक से दूसरों तक वायरस पहुंचने में वाहक का काम कर रहा हो। संक्रमण को ट्रेस करते हुए टेस्टिंग करने की जरूरत है। यदि वायरस का म्यूटेशन होता रहा तो इम्युनिटी, वैकल्पिक दवाएं, वैक्सीन इत्यादि भी बहुत समय तक प्रभावी नहीं रह पाएंगी।
इसलिए आकड़ों की बाजीगरी करने की बजाय धुआंधार टेस्टिंग करने, लोगों के बीच वायरस के संवहन को रोकने की जरूरत है। धुआंधार टेस्टिंग से अधिक से अधिक केवल यही नुकसान होना है कि दुनिया को यह मालूम पड़ेगा देश के लोगों को यह मालूम पड़ेगा कि प्रतिदिन कई करोड़ लोग संक्रमित हों रहे हैं, प्रतिदिन कई लाख लोग कोरोना से संक्रमित होकर मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं। लेकिन वायरस के म्यूटेशन को तो रोका जा सकता है, एक शरीर से दूसरे शरीर में संवहन को तो रोका जा सकता है। कोरोना की अगली लहरों की संभावनाओं को तो रोका जा सकता है।
नौकरशाही
Covid-19 वायरस संक्रमण जैसी परिस्थितियां मानव जाति के लिए ऐतिहासिक-विरली घटनाएं हैं। इन जैसी ऐतिहासिक परिस्थितियों से चलताऊ, रूटीन, रटी-रटाई सतही मानसिकता, सोच, रणनीतियों, तौर तरीकों इत्यादि से नहीं निपटा जा सकता है। व्यापक व दूरदृष्टि चाहिए होती है। इसलिए जरूरत होती है कि अपने जीवन में जो भी रूटीन में सीखा समझा है, जो भी चलताऊ जाना समझा सीखा है, जिन तौर तरीकों से रूटीन समस्याएं हल की जाती रहीं हैं, जिन तौर तरीकों से सफलता पाई जातीं रहीं हैं, जमा की गई संपत्तियों, पद प्रतिष्ठा व सेलिब्रिटिज्म इत्यादि-इत्यादि के अहंकार, कंडीशनिंग व सिखावट इत्यादि से बाहर आकर जीवन को समझना की चेष्टा की जाए।
Covid-19 वायरस जैसी ऐतिहासिक परिस्थिति में भारत की नौकरशाही के पास एक ऐसा अवसर था जब नौकरशाही वास्तव में कुछ सीखती समझती, संवेदनशील होने का प्रयास करती, अपने सामंती चरित्र के बाहर आकर लोकतांत्रिक मूल्यों को जानने समझने जीने का प्रयास करती। कम से कम ऐसी ऐतिहासिक परिस्थिति में तो इतनी अपेक्षा तो बनती ही है। मानसिकता व शैली बदलने का अवसर मिला था, लेकिन ……।
चूंकि भारत का संविधान अंग्रेजों द्वारा गुलाम भारत के लिए बनाए गए संविधान की नकल है, यही कारण है कि भारत में बहुत लोगों को यह भारी गलतफहमी रहती है कि जैसा संविधान भारत में है वैसा ही संविधान इंग्लैंड में भी है, इसलिए भी बहुत लोगों को भारत का संविधान लोकतांत्रिक संविधान लगता है, नौकरशाही का जो ढांचा गुलाम भारत को गुलाम बनाए रखने के लिए अंग्रेजों ने बनाया था, लोगों को लगता है कि ऐसे ही नौकरशाही ढांचे इंग्लैंड व अन्य देशों में भी हैं। यह भी एक बड़ा कारण है कि भारत में नौकरशाही ढांचे व चरित्र में कभी सवाल नहीं खड़ा किया जाता है। लोगों को लगता है कि दुनिया भर में ऐसा ही है और दुनिया ऐसे ही ढांचो से चलती है, यदि यह ढांचे नहीं रहे तो देश कैसे चलेगा जंगलराज हो जाएगा। वह बात अलग है कि नौकरशाही के ऐसे घटिया ढांचों के कारण ही भारत में नौकरशाही का जंगलराज चलता है, लोग अपनी अजागरूकता के कारण ठीकरा नेताओं के माथे फोड़ते रहते हैं।
चूंकि भारत में गुलामी की परंपरा को बनाए रखने वाली नौकरशाही ढांचे के पास अनापशनाप अधिकार होते हैं, अनापशनाप वेतन व राजसी सुविधाएं होतीं हैं। इसलिए आम लोगों व नौकरशाह लोगों में एक मिथक धारणा कूट-कूट कर भर जाती है कि नौकरशाह आम लोगों से बेहतर होता है, नौकरशाह लोगों के भले के लिए ही काम करता है, नौकरशाह लोगों का अभिभावक होता है, नौकरशाह बहुत ही अधिक योग्य होता है। यही कारण है कि भारत में नौकरशाही को दिन प्रति दिन और अधिक मिलते रहते हैं। नौकरशाही बहुत ही अधिक निरंकुश, असंवेदनशील व बर्बर होती चली जाती है। इसका कारण सिर्फ यह है कि भारत की नौकरशाही को राजतंत्र वाली शक्तियां व सुविधाएं प्राप्त हैं बिना जवाबदेही के। राजा तो परंपरा में ही ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता रहा है, राजा को सबसे अधिक योग्य, ईमानदार माना जाता रहा है। राजा को अपनी प्रजा का अभिभावक माता-पिता माना जाता रहा है। राजा की ही तरह नौकरशाही को भी सर्वगुण संपन्न माना जाता है।
भारत में नौकरशाही का ढांचा भीषण रूप से अलोकतांत्रिक व लोगों को गुलाम बनाए रखने के चरित्र का है। गुलाम भारत के लिए बनाई गई नौकरशाही को अनापशनाप अधिकार व सुविधाएं हैं, ऊपर से नौकरशाही की लोगों के प्रति जवाबदेह भी नहीं है। इसलिए नौकरशाही का अत्यधिक भ्रष्ट, सामंती, निरंकुश, असंवेदनशील व निर्दयी हो जाना अपने आप हो ही जाता है।
भारत में नौकरशाही की चयन प्रक्रिया में विशेषज्ञता, योग्यता व अभिरुचि का दूर-दूर तक लेना-देना नहीं। चूंकि नौकरशाही को लोगों के ऊपर राज करने जैसे अनापशनाप अधिकार, सार्वजनिक संपत्तियों को निरंकुश तरीके से भोगने के अधिकार व पब्लिक मनी से प्राप्त वेतन व सुविधाएं इत्यादि बिना जवाबदेही के प्राप्त होते हैं। इसलिए लोगों के अंदर अभिरुचि हो या न हो, अधिकतर लोग नौकरशाह ही बनना चाहते हैं। क्योंकि जो लोग तंत्र का हिस्सा नहीं हैं उनको तो मनुष्य भी नहीं माना जाता है। लोगों को गुलाम मानकर अत्याचार करने की परंपरा नए-नए म्यूटेशन के साथ आगे बढ़ती रहती है।
भारत के नौकरशाहों में से तो बहुत लोग खुद को व भारत की नौकरशाही को दुनिया का सबसे योग्य व बेहतर मानने के दंभ में जीते हैं। भारत के नौकरशाहों में से अपवाद प्रतिशत को यदि छोड़ दिया जाए तो किसी में योग्यता की बात छोड़िए मौलिक विचारशीलता तक नहीं होती है। विशेषज्ञता की स्थिति तो यह होती है कि इंजीनियरी स्नातक चिकित्सा विभाग का सचिव बनता है। ऐसा ही उल्टा-पुल्टा जमकर होता है। साधारण स्नातक करके, कुछ रूटीन किताबें रट लीजिए, अंक प्राप्त करने के तौर-तरीकों की नुक्ताचीनी सीख लीजिए। प्रश्न बनाने वाले या उत्तरपुस्तिका जांचने वाले दूसरे ग्रहों से आए एलियन तो होते नहीं हैं, होते तो भारतीय ढांचे के ही लोग हैं। रटना व रटने की कुशलता ही एकमात्र मापदंड होता है इस तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं का।
देश व समाज के विकास व प्रबंधन के लिए अनेक क्षेत्र होते हैं। उनके लिए बहुत ही अधिक विशेषज्ञता की जरूरत होती है। वैयक्तिक अपवादों को छोड़ भारतीय नौकरशाही की व्यवस्था/ढांचा/तंत्र इत्यादि में विशेषज्ञता होने की तत्व तो दूर, संभावना तक नहीं होती है। फिर भी राजतंत्र किस्म के अधिकारों, सुविधाओं व लोगों के प्रति गैरजवाबदेही के कारण खुद को विद्वान व योग्य मानने के सतहीपने का अहंकार आसमान छूता है।
भारत की नौकरशाही के दंभ में फूहड़ता तो इतनी अधिक है कि —
थर्मल सेंसर की साधारण डिवाइस से फटाफट लोगों का तापमान लेने को Covid-19 टेस्टिंग कहकर लोगों को धोखा दिया जाता रहा। जिलों को Covid-19 मुक्त घोिषत करके पुरस्कार लिए जाते रहे, मीडिया में वाहवाही लूटी जाती रहे। सोशल मीडिया में मूर्ख लोग वाहवाही को आसमान की बुलंदियों तक पहुंचाते रहे।
खुद को महायोग्य मानने वालों को क्या इतना भी पता नहीं था कि थर्मल स्क्रीनिंग Covid-19 संक्रमण की टेस्टिंग नहीं है जो लोगों को धोखा देते रहे, झूठ फैलाते रहे। करोड़ों रुपए बर्बाद करते रहे। क्या इतना भी नहीं पता था कि जिन थर्मल डिवाइस का प्रयोग थर्मल स्क्रीनिंग के लिए किया जा रहा है, उनकी इफीशिएंसी क्या है तथा एक डिवाइस किस परिस्थितियों में कम गड़बड़ी के साथ काम कर सकती है। नॉन-स्किल्ड निचले स्तर के कर्मचारियों को थर्मल डिवाइस पकड़ा दिया और कहा जाओ लोगों की Covid-19 टेस्टिंग करो। महीनों तक कर्मचारी व लोग यही मानते रहे कि यही Covid-19 टेस्टिंग है।
Covid-19 वायरस से संक्रमित लोगों की देखभाल करने की बजाय उनके साथ अपराधियों जैसा बर्ताव किया जाता रहा। खुद को लोगों का अभिभावक मानने वाले नौकरशाहों में क्या इतनी भी अकल नहीं थी कि वे यह जान सकें कि Covid-19 संक्रमित व्यक्ति बीमार होता है। बीमार व्यक्ति की देखभाल की जाती है, सेवा की जाती है न कि उसके साथ अपराधियों या आतंकवादियों जैसा बर्ताव किया जाता है।
ऐसा वायरस जिसने पूरी दुनिया को घुटने पर ला दिया। उससे निपटने के लिए नौकरशाही की जितनी मानसिक व विशेषज्ञता की तैयारी होनी चाहिए थी, उसका छटांक भी नहीं। फूहड़ता, झूठ, धोखाधड़ी, आकड़ों की बाजीगरी, बर्बरता इत्यादि ही नौकरशाही की योग्यता का मापदंड है।
इन्फ्रास्ट्रक्चर
हम बात-बात में इन्फ्रास्ट्रक्चर का रोना रोने लगते हैं। हम महीनों तक कहते रहे कि टेस्टिंग इसलिए नहीं हो रही है क्योंकि टेस्टिंग करने के लिए सामान नहीं है। फिर कुछ दिनों बाद रातों रात टेस्टिंग के आकड़ों में लाखों टेस्टिंग प्रतिदिन दिखाया जाना शुरू हो गया। यही सब पहले भी तो किया जा सकता था, दुनिया के कई देश कर रहे थे, हम भी कर सकते थे। हम वैक्सीन खोजने का दिखावा कर सकते हैं लेकिन टेस्टिंग करने जैसी छोटी सी चीज करने का माद्दा नहीं रखते हैं।
भारत में लगभग ढाई लाख ग्राम-पंचायत हैं। 6000 से अधिक CHC हैं, 30 हजार से अधिक PHC हैं, लगभग दो लाख स्वास्थ्य केंद्र हैं। एक CHC में डाक्टरों सहित लगभग 25 लोगों का स्टाफ होता है। एक PHC में डाक्टर सहित लगभग 15-17 लोगों का स्टाफ होता है। एक स्वास्थ्य केंद्र में दो लोगों का स्टाफ होता है। इनके अलावा जिला अस्पताल होते हैं, मेडिकल कालेजों के अस्पताल होते हैं। बड़े शहरों में एक से अधिक अस्पताल होते हैं। केंद्र सरकार के भी मेडिकल कालेज व अस्पताल होते हैं। यदि जिला अस्पतालों, मेडिकल कालेजों इत्यादि को न भी जोड़ा जाए, केवल PHC, CHC व स्वास्थ्य-केंद्रों की बात की जाए तो भी भारत में ढाई लाख ग्राम पंचायतों के लिए लगभग चार लाख स्वास्थ्य कर्मी हैं।
मान लीजिए कि यह इन्फ्रास्ट्रक्चर कागज पर ही है। तब भी सवाल तो खड़ा होता है कि देश के लोगों ने तो इस इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए संसाधनों व पैसे का इंतजाम किया जिसे नौकरशाही का भ्रष्टाचार हजम कर गया। यह अपराध किसका हुआ? लोगों का या इन्फ्रास्ट्रक्चर का या नौकरशाही का? जाहिर है कि नौकरशाही का।
भारत के पास इतना तो इन्फ्रास्ट्रक्चर है ही कि भारत के लोगों की Covid-19 टेस्टिंग सलीके से की जा सके। लोगों को Covid-19 के बारे में जागरूक किया जा सके। लेकिन ऐसा नहीं हो पाने में दोष इन्फ्रास्ट्रक्चर से अधिक भ्रष्टाचार व लोगों के प्रति असंवेदनशीलता व गैर-जवाबदेही का है। दोष नौकरशाही की अक्षमता, अयोग्यता व दृष्टि-हीनता का है।
इम्युनिटी का फर्जी-दंभ : मिथक
लगभग 103 साल पहले सन 1918 में जब भारत में फ्लू फैला तब भारत की जनसंख्या लगभग 24 करोड़ थी, और फ्लू के कारण देश भर से लगभग डेढ़ करोड़ लोग मृत्यु को प्राप्त हुए। यह संख्या दुनिया के देशों में हुई 1918 के फ्लू महामारी के कारण हुई मौतों में किसी देश में होने वाली मौतों की सबसे अधिक थी। फ्लू महामारी का प्रकोप भारत में कई वर्षों तक रहा और जन-जीवन की भारी क्षति हुई।
भारत में अब जबकि गांव-गांव का किसान वर्षों से रासायनिक खाद का प्रयोग करता आ रहा है, रासायनकि कीटनाशकों का प्रयोग करता आ रहा है, वायु व जल व औद्योगिक हर तरह का प्रदूषण बहुत ही अधिक बढ़ता जा रहा है। जिसके पास भी कुछ संपत्ति हो जाती है वह शहर भागना चाहता है। गांव के खुले वातावरण की बजाय शहरों के घुटन भरे वातावरण में जीना विकास व सभ्यता माना जा रहा हो। घर में बनाई गई चीजों की बजाय, घटिया तरीके से बनाई जा रहीं बाजारू चीजों का सेवन करना समृद्धि, सभ्यता, विकास इत्यादि के रूप प्रतिष्ठित कर लिया गया हो। ऐसे में हमारी इम्युनिटी का वास्तविक स्तर क्या है, यह समझना अंतरिक्ष यान बनाने जैसा कठिन तो बिलकुल भी नहीं।
हम भारतीय जिन आधारों पर भारतीय लोगों की इम्यूनिटी मजबूत होने का भ्रम पालते हैं, जाहिर है कि उन आधारों पर 1918 के समय में हम भारतीयों की इम्युनिटी आज की तुलना में बहुत-बहुत अधिक होगी. उस समय तो भारत में एलोपैथ भी नहीं था। अंग्रेजों को छोड़ लगभग सभी लोग जड़ी-बूटियों व आयुर्वेद का ही प्रयोग चिकित्सा के लिए करते थे। उस समय एक से बढ़कर एक विद्वान वैद्याचार्य होते थे। फिर भी 24 करोड़ की जनसंख्या में फ्लू महामारी के कारण लगभग डेढ़ करोड़ लोगों की मृत्यु हुई। असल आकड़े इस संख्या से अधिक हो सकते हैं। मोटा-मोटी मान सकते हैं कि कुल जनसंख्या का लगभग दसवां हिस्सा मृत्यु को प्राप्त हो गया था। फ्लू से हुई मौतों में अंग्रेजों का प्रतिशत नगण्य था, जबकि भारतीय लोग कुल जनसंख्या का 8 से 10% लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए थे। जाहिर है कि हमें इम्युनिटी की विशिष्टता के दंभ से बाहर आ जाना चाहिए, यह दंभ बहुत ही अधिक घातक है।
हमें यदि Covid-19 वायरस के प्रकोप से बचना है, अपने प्रियजनों को बचाना है तो हमें इस वायरस के संवहन को रोकना होगा ताकि यह म्यूटेशन करके और अधिक खतरनाक नही बनता रहे। हमें अपने आपको इम्यूनिटी मजबूत के मिथक से बाहर निकालना होगा। बहुत लोग जो पिछली बार खुद को मजबूत इम्युनिटी का समझ रहे थे और दूसरे लोगों को ज्ञान बांट रहे थे, उनमें से अनेक इस बार की लहर में अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गए। बहुत लोग जो इस बार खुद को मजबूत इम्युनिटी का समझ रहे हैं, दूसरे लोगों को ज्ञान बांट रहे हैं। उनकी परिणति अगली कोरोना लहरों में विकट हो सकती है।
यदि Covid-19 वायरस का एक शरीर से दूसरे शरीर में संवहन होता रहा और म्यूटेशन का अवसर मिलता रहा तो न तो व्यक्तिगत इम्युनिटी काम आ पाएगी, और ना ही कभी भी हर्ड इम्युनिटी ही संभव हो पाएगी। इसलिए बचकाने तर्कों से बाहर निकल कर गंभीरता से सोचने विचारने की जरूरत है। Covid-19 वायरस जैसे स्मार्ट वायरस पर समाज व देश के लोगों का सामूहिक व पारस्परिक विश्वसनीय़ प्रयास ही विजय दिलवा सकता है।
हम व हमारा समाज : ढोंगी चरित्र
भ्रष्टाचार
Covid-19 वायरस जैसी अद्वितीय ऐतिहासिक परिस्थिति में जब हमें व हमारे समाज को एक दूसरे के साथ खड़ा होना था, तब हमने अपने ही लोगों को लूटना शुरू कर दिया। हमने दवाओं व चिकित्सा सुविधाओं की जमाखोरी शुरू कर दी भले ही हमारे सामने कोई मनुष्य तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हो।
जिस समय लोगों की नौकरियां जा रहीं हो, जिस समय लोगों का धंधा बंद हो रहा हो, जिस समय लोगों की आय कम हो रही हो, जिस समय साबुन मास्क सैनेटाइजर इत्यादि के कारण खर्चे बढ़ रहे हों। उस समय हमने जीवन की रोजमर्रा की जरूरत के सामानों, खाद्य सामग्री के मूल्य कई-कई गुने कर दिए। जिस समय हमें अपने ही देश के लोगों के लिए संवेदनशील होना चाहिए था, जिस समय हमें एक दूसरे के सुख दुख में साथ खड़ा होना था। हमने इसे आपदा में अवसर की तरह देख कर अपनों को ही लूटना शुरू कर दिया।
हम जानते हैं कि बिना Covid-19 वायरस के सामान्य परिस्थितियों में भी गरीब व निरीह लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पाती हैं। फिर भी हमने इन लोगों का जीवन और दुरूह करने के लिए, केवल भविष्य की स्थितियों की संभावना के कारण दवाओं इंजेक्शन व अन्य चिकित्सा सुविधाओं की जमाखोरी शुरू कर दी।
जबकि यह संभव है कि हमें कभी जरूरत ही न पड़े, जबकि आज और अभी इन वस्तुओं से मनुष्यों का जीवन बचाया जा सकता है, लेकिन हमने आज लोगों का जीवन बचाने की बजाय, भविष्य में अपने जीवन पर आने वाले संभावित खतरे के लिए आज ही जमाखोरी कर ली। भले ही हमारी आज की जमाखोरी जब हम पर खतरा आए तब तक वह वस्तु खराब हो चुकी हो या Covid-19 वायरस इतना म्यूटेशन कर चुका हो कि जो हमने अपने जीवन की सुरक्षा के लिए जमाखोरी की थी, वह किसी काम ही नहीं आए।
धार्मिक घृणा का नशा
हम भारतीय अपने व अपनी पीढ़ियों के भविष्य को तय करने वाली सरकारों के चयन में अपनी व अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की चिंता करने की बजाय; जनप्रतिनिधियों के कामकाज, सोच, दृष्टि व विजन इत्यादि की बजाय धार्मिक घृणा को प्राथमिकता देते हैं। हम पर धार्मिक घृणा का नशा इस कदर हावी हो चुका है कि अब हम हमारे, हमारे जीवनसाथी, हमारे बच्चे, हमारे परिवार, हमारे रिश्तेदार, हमारे प्रियजन, हमारे समाज व देश के लोगों के जीवन-मृत्यु जैसी परिस्थितियों में भी हम धार्मिक घृणा के नशे को ही खुद पर हावी होने दे रहे हैं।
हमने Covid-19 वायरस जिससे पूरी दुनिया हलकान थी, हमने इस वायरस से बचने के लिए जरूरी इंतजाम करने की बजाय धार्मिक घृणा के नशे में लिप्त होकर अपने अंदर भरी हुई धार्मिक घृणा की कुंठित मानसिकता की नीचता को प्राथमिकता दी। हम धार्मिक घृणा के नशे के कारण इतना नीचे गिर चुके हैं कि अपने जीवन-मृत्यु की परिस्थितियां, अपने स्वास्थ्य इत्यादि को भी दांव पर लगाने लगे हैं।
समाधान की दिशा
यदि सरकार व नौकरशाही इत्यादि के चरित्र की बात नहीं की जाए तो भी हम भारतीय अपना व अपने समाज का चरित्र देख सकते हैं।
हमारे चरित्र व हमारे द्वारा चुनी गई सरकारों हमारे देश की नौकरशाही के चरित्र में अंतर नहीं। जनप्रतिनिधि हों या नौकरशाह या सरकारी तंत्र में कोई और — आते तो हमारे आपके बीच से ही हैं, होते तो हमारे आपके परिवार वाले या रिश्तेदार ही। ये वही लोग हैं जिनका चरित्र या हम गढ़ते हैं या इनके द्वारा हमारा चरित्र गढ़ा गया होता है।
Covid-19 वायरस जैसी ऐतिहासिक-विरली परिस्थिति में भी हमने या हमारे जन-प्रतिनिधियों या नौकरशाही ने अच्छाई संवेदनशीलता महानता का ढोंग-ढकोसला जमकर किया लेकिन अपने मूल चरित्र को नहीं बदला। हमारे समाज में बिना ढोंग के वास्तव में अंदर से संवेदनशील व सामाजिक-सक्रिय लोगों का प्रतिशत बहुत ही कम है, ये लोग चाहे Covid-19 हो या न हो, लेकिन समाज के लोगों के लिए खड़े होते रहते हैं, वही प्रतिशत इस महाविकट परिस्थिति में आगे आया, इन लोगों से प्रेरित होकर कुछ और प्रतिशत लोग भी आगे आ रहे हैं, कुछ और प्रतिशत लोग विभीषिका से डरकर अपने भविष्य की कल्पना करके आगे आ रहे हैं।
क्या जीवन मृत्यु की इस भयानक ऐतिहासिक परिस्थिति में भी हम सभी अपने अंदर की ईर्ष्या, कुंठा, घृणा, अहंकार इत्यादि को परे रखकर एक दूसरे को अपना सगा-परिवार मानकर एक दूसरे के साथ बिना शर्त, बिना अपेक्षा कंधे से कंधा मिलाकर इस Covid-19 वायरस से नहीं लड़ सकते हैं। जीना मरना तो वैसे है ही तो क्यों न आपस में एक जुट होकर लड़े, शायद विजय मिल जाए।
लेकिन हमारे अंदर यह भावना व प्रतिबद्धता केवल और केवल तब ही विकसित हो सकती है जब हम Covid-19 वायरस को गंभीरता से लें। हम इतने जागृत हों कि इसके चरित्र से परिचित हों, यह भविष्य में कितना भयंकर हो सकता है यह देख पाने की दृष्टि हम विकसित कर पाएं।
हमारी मानसिक/वैचारिक कुंठाएं
राष्ट्र/संस्कृति गौरव : ढोंग तमाशा
जिस समय इटली व अन्य देशों में Covid-19 वायरस बेहतरीन चिकित्सा व्यवस्थाओं व प्रबंधन के बावजूद कहर बन कर टूट रहा था। हम विकसित देशों के प्रति अपने अंदर छिपी हुई ईर्ष्या की कुंठा से ग्रस्त खुद को जबरन बेहतर मानकर प्रोपागंडा करने में लिप्त थे। जबकि उसी समय दुनिया के कुछ देश जहां Covid-19 नहीं फैला था, वे अग्रिम तैयारी कर रहे थे ताकि जब तक वायरस उनके यहां तक पहुंचे तब तक वे इससे लड़ने के लिए काफी तैयारी हो चुकी हो।
जिस समय हम ईर्ष्या की कुंठा से ग्रस्त होकर तालिया बजाते हुए हसते हुए जबरिया यह झूठा प्रोपागंडा कर रहे थे कि दुनिया हमारा नमस्ते सीख रही है। जिस समय हम जबरिया अपनी महानता का बखान करने की कुंठा में जी रहे थे। उस समय दुनिया के कई देश भविष्य की परिस्थितियों के लिए तैयारी कर रहे थे।
हमारे देश में लाखों लोग प्रतिवर्ष सामान्य फ्लू, सामान्य बुखार से अकाल मृत्यु को प्राप्त होते हैं। हमारे देश में भ्रष्टाचार के कारण, लोगों की अजागरूकता के कारण चिकित्सा तंत्र व ढांचा बेहद सड़ा हुआ है, हमें यह सब मालूम है। इसके बावजूद हमने यह नहीं सोचा कि हमारा देश सौभाग्यशाली है जो हमें समय मिल रहा है ताकि जब Covid-19 वायरस हमारे यहां फैलना शुरू होगा उससे पहले ही हम कुछ तैयारी कर चुके होंगे, ताकि इस वायरस की विभीषिका कम हो सके।
हम चाहते तो अस्पतालों, अस्पतालों में बिस्तरों, ICU बिस्तरों, वेंटिलेटर्स, वैकल्पिक दवाओं इत्यादि का इंतजाम करते। हम चाहते तो हम एकजुट होकर अपने देश के नौकरशाही तंत्र व सरकार को सामंती चरित्र से बाहर आने के लिए मजबूर करते, लोगों के प्रति जवाबदेह बनाते। लेकिन हमने अपनी ईर्ष्या व कुंठाओं को ही प्राथमिकता दी।
हमने अनेक राष्ट्र-गौरव व संस्कृति-महानता के अनेक फर्जी तमाशे खड़े किए। जब देश के करोड़ों लोगों का जीवन का खतरे में हो तब भी फर्जी राष्ट्र-गौरव का झूठा तमाशा किया ही जाए, इतनी कुंठा क्यों है हम लोगों में। जब लोग ही नहीं रहेंगे तो किस बात का राष्ट्र व किस बात का राष्ट्र-गौरव। हर समय तमाशों की जरूरत नहीं होती है। मनुष्य जीवन महत्वपूर्ण होता है।
नतीजा हम देख रहे हैं। जब दुनिया के वे देश जिनको पिछले वर्ष संभलने का अवसर छोड़िए Covid-19 वायरस है क्या, यह तक समझने का अवसर तक नहीं मिला था, इसके बावजूद ऐसे देश वायरस पर विजय पाने की ओर बढ़ रहे हैं। तब हम जिन्हें संभलने व तैयारी करने का पर्याप्त समय मिला था, इसके बावजूद हम प्रतिदिन बहुत सारे अपनों को खो रहे हैं।
काश हम इतना सब खो चुकने बाद, केवल यही सीख लें कि हमें पहली प्राथमिकता के साथ अपनी कुंठाओं व तमाशों से बाहर आने का प्रयास करना है।
विद्वता-दंभ : सैडिज्म
हम लोगों के अंदर कुंठित सैडज्म का हाल तो यह है कि हमें कुछ नहीं भी पता होता है , जिस विषय की बिलकुल भी समझ नहीं होती है। उस पर भी अपना ज्ञान बघारने के लिए गूगल सर्च करके जो गलत सही, उल्टा सीधा, फर्जी मतलब कुछ भी मिल जाए, उसको हम अपने एजेंडे में फिट करने के लिए अपने हिसाब से तर्क वितर्क कुतर्क करके तोड़ मरोड़ करके आकार प्रकार रंग-रूप दे देते हैं। और जुट जाते हैं ज्ञान की गंगा बहाने में।
जो भी हमें अपने एजेंडे में फिट होता दिखे या जो भी हमें मजेदार लगे या जो भी हमें आकर्षक लगे। हम बिना किसी जवाबदेही के, बिना किसी जांच पड़ताल के, बिना किसी शोध-विमर्श के, सबसे अधिक तथ्यात्मक मानकर सबसे अधिक सच्चा मानकर जुट जाते हैं। दूसरों को भी मजबूर करते हैं कि वे भी ऐसा ही मानें। बेढंगी नकल करना हमारे डीएनए के चरित्र में है।
पिछले वर्ष इटली के नाम से फर्जी गढ़ी गई एक पोस्ट जिसमें बहुत आकर्षक मसालों के साथ कोरोना संक्रमण फैलने के चरणों की बात की गई थी, हमने जबरदस्त वायरल किया, इतना वायरल किया कि देश के लगभग सभी धाराओं के लोग उसी के आधार पर मूल्यांकन व घोषणाएं करने लगे। मेरे जैसे लोग कहते रहे कि यह सही नहीं है, लेकिन नक्कारखाने में तूती की आवाज का कोई मतलब ही नहीं रहता, ऊपर से हमारे अंदर कूट-कूट भरी हुई विद्वता का दंभ, हमारा सैडिज्म।
हमारे देश के राष्ट्रीय स्तर के चिकिस्ता संस्थानों ने भी Covid-19 वायरस के बारे में बिना जानेबूझे सतही बातें कीं। हमारे बहुत सारे डाक्टरों ने भी ऐसा ही किया। इन लोगों ने यह नहीं स्वीकारा कि ये लोग नए वायरसों के बारे में नहीं जानते हैं, इन लोगों ने रटी रटाई बातें कीं। मेरी दृष्टि में इन लोगों ने देश के लोगों को धोखा दिया। देश के लोगों को दवा देने वाले, इलाज करने वाले डाक्टरों व चिकित्सा विज्ञान में शोध करने वाले वैज्ञानिक-डाक्टरों में अंतर ही नहीं मालूम।
बकैती करना भी हमारे डीएनए में है। दो-दो कौड़ी के लेखकों जो नकल उतार करके किताबें लिखते हैं जो हमारे स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं। हमने सोशल मीडिया में उनकी किताबों के पन्ने स्कैन करके साझा किए और विद्वता के दंभ के सैडिज्म के साथ बताया कि देखो जिस वायरस से दुनिया परेशान है, उस वायरस के बारे में हमारे देश के आठवीं दसवीं कक्षा में चलने वाली किताब में लेखक लोग दशकों पहले लिख चुके हैं। हम अपनी मूर्खता पर दंभ कर रहे थे कि देखो जिस वायरस के बारे में दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक संस्थान नहीं जानते हैं, उस वायरस के बारे में हमारे देश के स्कूल के लिए किताबें लिखने वाला लेखक दशकों पहले से जानता था, न केवल जानता था बल्कि किताबों में लिख भी रखा है।
ऐसे ही आजकल हम मास्क, वैक्सीन, वैकल्पिक दवाओं इत्यादि मुद्दों पर जबरदस्त ज्ञान बांट रहे हैं, जहां भी जरा सी जगह दिखी वहीं राष्ट्र/संस्कति गौरव, विद्वता जबरिया ठूंस दे रहे हैं। हमें जिन विषयों की गहरी छोड़िए टुच्चे स्तर की भी जानकारी नहीं। लेकिन चूंकि हमारी विद्वता कुलबुलाती रहती है तो हमें विद्वता छलकानी ही होती है इसलिए कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, कहीं का कुछ भी कूड़ा कचरा उठाकर कुछ तोड़-मरोड़ करके विद्वता के रूप में परोस देना है, पटक देना है।
अज्ञान, अजानकारी व मूर्खता को विद्वता की ऊंचाई मानकर दंभ करने वाला समाज व समाज के लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण का स्तर क्या हो सकता है, यह कल्पना करके ही सिरहन उठ जाती है। यूं लगता है कि हम व हमारा समाज हमेशा चौबीसों घंटे बेहोशी में ही रहते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि हम लोग बर्बरता के स्तर तक के कुंठित व हीनभावना से ग्रस्त लोग हैं। बर्बरता के स्तर तक पहुंचना ही हमें सैडिस्टिक बना देता है। हमने पिछले एक-डेढ़ वर्षों में बेशर्मी के साथ बर्बरता के साथ जमकर रायता फैलाया है। जो आज हमारे देश के करोड़ों लोग भोग रहे हैं, उसके लिए हमारा सैडिज्म बहुत बड़ा दोषी है। हमें अब अपनी विद्वता पर लगाम लगाना चाहिए, अपने सैडिज्म को नियंत्रित करना चाहिए। ताकि हम अपने देश की स्थिति और अधिक नर्कीय न बनाएं। हम अपना सैडिज्म Covid-19 पर संपूर्ण विजय प्राप्ति के बाद भी जी सकते हैं, लेकिन अभी इसी पल से हम अपने सैडिज्म को नियंत्रित कर लें।
एलोपैथ के प्रति हमारी प्रतिक्रिया
हमारे देश में हम लोगों में से बहुत लोगों का एक जबरदस्त फैशन है, वह यह कि हम एलोपैथ को जमकर गाली देते हैं और हर बात में आयुर्वेद व होमियोपैथ को ठूंस देते हैं। हमें इन सब से बाहर आ जाना चाहिए। हमें खुद को ऑब्जेक्टिविटी से देखने समझने जांचने परखने लायक योग्य बनाने का प्रयास करना चाहिए।
दुनिया के विकसित देशों में एलोपैथ जैसा नहीं होता। चिकित्सा विज्ञान होता है। लेकिन हमारा समाज पाश्चात्य देशों के चिकित्सा विज्ञान को एलोपैथ कहता है। चूंकि अंग्रेजों ने भारत को गुलाम बनाया था, पाश्चात्य देशों के चिकित्सा विज्ञान को भारत अंग्रेज लाए थे। इसलिए हम इसे पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान की बजाय एलोपैथ कहते हैं और इंग्लैंड द्वारा भारत को गुलाम बनाए जाने की प्रतिक्रिया के कारण हम एलोपैथ को घटिया मानने की मानसिकता में जीते हैं।
जड़ी-बूटी हो वनस्पति हो, होमेयोपैथ में फूलों व वनस्पतियों का अर्क हो। सभी में रसायनों व तत्वों का प्रयोग होता है। पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान में भी होता है। मानव शरीर रसायनों व तत्वों से मिलकर बना है, शरीर की समस्त गतिविधियां विभिन्न प्रकार के रसायनों व तत्वों पर ही निर्भर हैं। मानव शरीर में रसायनों/तत्वों की मात्रा कम अधिक होने से, रसायनों की क्रिया-प्रतिक्रियाओं के परिणामस्वरूप जो प्रभाव होते हैं उनको साइड इफेक्ट कहा जाता है। साइड इफेक्ट्स आयुर्वेद, होमेयोपैथ व एलोपैथ सभी में होते हैं।
हम भ्रष्टाचार, बेईमानी, बेहतर गुणवत्ता मानदंड न होने, दवाओं के निर्माण की गलत या हानिकारक प्रक्रिया, दवाओं के प्रयोग करने इत्यादि-इत्यादि जैसे गंभीर मुद्दों पर सवाल खड़ा करने की बजाय एलोपैथ को गाली देना शुरू कर देते हैं। एलोपैथ को गाली देने का सबसे मुख्य कारण पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान को इंग्लैंड का समझना तथा इंग्लैंड के द्वारा भारत को गुलाम बनाए जाने की प्रतिक्रिया है।
Covid-19 वायरस को लेकर हम लोगों ने सही-गलत, तथ्यात्मक-अतथ्यात्मक कुछ भी जमकर फैलाया है। हमारी इन सब गैर-जिम्मेदाराना व्यवहारों को करने के पीछे के कारकों में से आयुर्वेद रूपी राष्ट्र/संस्कृति गौरव व एलोपैथ के प्रति हमारी प्रतिक्रिया इत्यादि हैं। जबकि हमारी प्राथमिकता जीवन की सुरक्षा व Covid-19 का एक शरीर से दूसरे शरीर में संवहन को पूरी तरह से अवरुद्ध करना होनी चाहिए।
होमियोपैथ बनाम हमारी लंबरदारी
मैं आज तक यह नहीं समझ पाया कि एलोपैथी को रातदिन गाली देने वाले लोग होमेयोपैथ-होमेयोपैथ क्यों चिल्लाते रहते हैं, इतना ही नहीं बाकायदा होमेयोपैथ की लंबरदारी करते हैं। जबकि होमेयोपैथ पाश्चात्य देशों की ही चिकित्सा पद्धति है, मतलब होमेयोपैथ भी एलोपैथ ही है।
होमेयोपैथ पाश्चात्य देशों की चिकित्सा विज्ञान के आगे बढ़ने की श्रंखला में बीच की एक कड़ी है। रसायन विज्ञान का विकास होने की प्रक्रिया में होमेयोपैथ का उद्भव हुआ। ज्यों-ज्यों भौतिकी व रसायन विज्ञान का विकास होता गया, आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी समृद्ध होती चली गई, परिणामतः पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान होमेयोपैथ को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ गई। होमेयोपैथ के जनक देश जर्मनी में भी पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान का ही प्रयोग होता है।
लेकिन हमारे भारतीय समाज में बहुत लोग होमेयोपैथ के प्रति बहुत अधिक आकर्षण महसूस करते हैं। इसका भी कारण पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान को इंग्लैंड की मानने के मिथक के कारण प्रतिक्रिया ही है। एक कारण यह भी है कि होमेयोपैथ के बारे में एक मिथक स्वयंभू-स्थापित कर लिया गया है कि होमेयोपैथ का साइड इफेक्ट नहीं होता है। एक कारण यह भी है कि होमेयोपैथ की दवाएं सरलता से याद करके इस्तेमाल की जा सकतीं हैं।
भारत में चिकित्सा व्यवस्था कभी आमजन के प्रति सहज सुलभ व जवाबदेह हो ही नहीं पाया। भ्रष्टाचार, लालफीता-शाही, गुणवत्ता-हीनता, बेईमानी, गैर-जिम्मेदारी व असंवेदनशीलता के कारण लोगों का चिकित्सा व्यवस्था में विश्वास नहीं हो पाता है, उल्टे भय लगता है। वहीं होमेयोपैथ की दवाओं को हम लोग सरलता से रटकर, अपने स्तर पर दवाओं का प्रयोग करते हुए ट्रायल-एरर के आधार पर दवाओं के प्रयोग के बारे में सरलता से सीख सकते हैं, कुछ लोग सीखते भी हैं। यह वैसा ही है जैसे हम लोग जड़ी बूटियों वनस्पतियों इत्यादि का सेवन करना सीख लेते हैं, एलोपैथ की दवाओं का सेवन करना सीख लेते हैं।
आयुर्वेद
दुनिया का हर एक देश, हर एक समाज आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के विकसित होने के पहले के काल में ट्रायल-एरर के अनुभव पर आधारित जड़ी-बूटियों व वनस्पतियों इत्यादि का ही प्रयोग करता था।
मानव-जाति की बात छोड़िए जानवरों को भी प्रकृति ने इतना समझदार बनाया है कि उन्हें तक पता होता है कि जब वे बीमार महसूस करते हैं तो उन्हें कौन सी वनस्पति खानी है या क्या करना है। इसलिए यह मानना कि दुनिया में केवल हम ही ऐसे हैं जिनके पूर्वजों के पास जड़ी-बूटियों व वनस्पतियों इत्यादि का ज्ञान था, तो ऐसा मानना हमारी अज्ञानता है।
लगभग 103 साल पहले 1918 में जब भारत में फ्लू ने करोड़ों लोगों को अकाल मृत्यु में पहुंचाया था। तब उस समय वायु जल व खाद्य प्रदूषण नहीं था। एलोपैथ नहीं था (एलोपैथ इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि बहुत लोग एलोपैथ के सर पर ही ठीकरा फोड़ते रहते हैं)। भारत में चहुंओर आयुर्वेद व जड़ी बूटियों का ही बोलबाला था। अधिकतर लोग गांवों में ही रहते थे, अधिकतर लोग खेतीबाड़ी से जुड़े कामकाज ही करते थे।
इसलिए हमें इन सब बचकाने तर्क-वितर्क-कुतर्क से बाहर निकल कर Covid-19 वायरस काल में हमारा शरीर जिस भी पद्धति से सुरक्षित हो, हमें करना चाहिए वह भी बिना दूसरी पद्धतियों को गाली दिए हुए। गाली गलौच हम कोरोना से मुक्त होने के बाद भी कर सकते हैं। अभी हमारी प्राथमिकता केवल और केवल लोगों के जीवन की सुरक्षा तथा Covid-19 वायरस का एक शरीर से दूसरे शरीर में संवहन को रोकना होना चाहिए।
षणयंत्र देखने की फर्जी-कम्युनिज्म विकृति
चीन हो, उत्तरी-कोरिया हो, रूस हो या रूस के गुट के देश हों, कहीं भी साम्यवाद या कम्युनिज्म नहीं रहा। कम्युनिज्म के नाम पर तानाशाही ही रही। तानाशाही पर लोग सवाल नहीं खड़ा कर पाएं, इसलिए फर्जी कम्युनिज्म को एक दुश्मन की स्थापना करनी पड़ती है। चीन एक निहायत धूर्त व क्रूर साम्राज्यवादी देश है, जिन देशों को साम्राज्यवादी कहता है उन्हीं की बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए चीन के लोगों को मजदूर बना कर रख दिया है। लेकिन सब जायज है क्योंकि चीन ने लोगों का ध्यान बांटने के लिए साम्राज्यवाद के नाम का एक दुश्मन स्थापित कर रखा है।
जितने भी लोगों का चीन किस्म के तथाकथित कम्युनिज्म के प्रति आकर्षण होता है, उनको हर बात में षणयंत्र देखने में एक अजीब किस्म का बौद्धिक आनंद मिलता है। उनकी तार्किकता यही सब करने की धींगामुस्ती में लिप्त रहती है।
Covid-19 के संदर्भ में हमने यही किया। हम इसे दवा कंपनियों व कारपोरेट व सरकारों का षणयंत्र बताने में लिप्त रहते हुए एक किस्म के सैडिज्म का आनंद लेते आए हैं। षणयंत्र हो सकता है या नहीं हो सकता है, इस पर लंबी चर्चा यहां करने का कोई औचित्य नहीं है।
यहां पर सिर्फ यह कहना है कि षणयंत्र हो या नहीं हो कि बौद्धिक बहसबाजी या तर्क-सैडिज्म से जीवन की सुरक्षा नहीं होनी है। वायरस है और देश के करोड़ों लोगों के जीवन से गंभीर खिलवाड़ कर रहा है, लोगों के जीवन को हानिकारक रूप से प्रभावित कर रहा है। इसलिए षणयंत्र इत्यादि की तार्किक विलासिता की बहसबाजी को Covid-19 वायरस से मुक्त होने तक निलंबित किया जा सकता है। इस वायरस से मुक्त होने तक, केवल और केवल इस वायरस से जीवन को सुरक्षित रखने तथा एक शरीर से दूसरे शरीर में संवहन होने को पूरी तरह से रोकने तथा इस स्मार्ट वायरस को विकसित होते हुए और अधिक खतरनाक होते रहने से रोकना एकमात्र प्राथमिकता होनी चाहिए।
लॉकडाउन के बारे में
यह दुनिया का ऐसा ऐतिहासिक-अद्वितीय वायरस है जिसने पूरी दुनिया को लगभग बंद कर दिया। दुनिया भर के यातायात बंद हो गए। औद्योगिक ईकाइयां बंद हो गईं। आर्थिक ढांचा ठप्प पड़ गया। दुनिया के लगभग सभी देशों में किसी न किसी प्रकार का लाकडाउन हुआ। अनेक देशों में तो पिछले एक वर्ष से भी अधिक समय से लगने हटने की प्रक्रिया चलती आ रही है।
दुनिया के कुछ देशों ने इस वायरस का चरित्र समझ कर, सोच विचार कर, लोगों की चिंता करते हुए लाकडाउन किए। जबकि अनेक देशों ने इन कुछ देशों की नकल उतारते हुए बिना सोचे समझे, बिना किसी योजना या व्यवस्था के लाकडाउन लगाए, कुछ देशों में तो लोगों को कीड़े मकोड़े मानते हुए उन पर आत्याचारी किस्म के लाकडाउन थोप दिए और अपने देश के लोगों के जीवन को नर्कीय बना दिया।
लाकडाउन क्यों
Covid-19 वायरस बहुत ही अधिक स्मार्ट है जो अवसर पाते ही अपने अगले संस्करण का विकास कर लेता है। इसलिए इस वायरस के म्यूटेशन को रोकने के लिए सिर्फ और सिर्फ एक ही तरीका है वह है कि इस वायरस को एक शरीर से दूसरे शरीर में जाने का अवसर नहीं मिले, ताकि इस वायरस को सामाजिक समूहों के लोगों के शरीरों की आंतरिक संरचना, व्यवस्था व तंत्र को समझने का अवसर नहीं मिले।
यदि इस वायरस के एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवाहित होने की प्रक्रिया को नहीं रोका जाता है तो यह लगातार अपने आपको मजबूत करता रहता है। इसका परिणाम यह होता है कि यह वायरस जिन लोगों को अपने पुराने संस्करणों से संक्रमित तो करता है लेकिन बीमार नहीं कर पाता है या बहुत बीमार नहीं कर पाता है, उनको भी बहुत बीमार कर पाने की क्षमता अपने अगले संस्करणों में प्राप्त कर लेता है।
इस वायरस के एक शरीर से दूसरे शरीर में प्रवाह को सिर्फ एक तरह से ही रोका जा सकता है जब संक्रमित व्यक्ति द्वारा संक्रमण किसी भी हालत में आगे नहीं बढ़े। यहां संक्रमित व्यक्ति का मतलब उन सभी संक्रमित लोगों से है जो संक्रमित हैं भले ही उनको कोई लक्षण न दिखे, या हल्का बीमार पड़ें या बहुत अधिक बीमार पड़ें।
जब कम्युनिटी-संक्रमण होता है तब लाकडाउन ही एकमात्र रास्ता बचता है। लाकडाउन इसलिए होता है ताकि Covid-19 वायरस को एक मानव से दूसरे मानव में जाने के अवसर कम से कम उपलब्ध हों या बिलकुल ही उपलब्ध नहीं हों। जब व्यक्ति एक दूसरे के संपर्क में आता ही नहीं तो संक्रमण की गति भी अपने आप धीमी होती चली जाती है। जब व्यक्ति आइसोलेट होता है तो दूसरे व्यक्तियों व वस्तुओं के संपर्क में नहीं आता है, इस प्रकार संक्रमित व्यक्ति न तो अन्य व्यक्तियों को संक्रमित करता है न ही प्रयोग की गई या स्पर्श की गई वस्तुओं के माध्यम से अन्य व्यक्तियों को संक्रमित करता है।
Covid-19 संक्रमण की गति को कम करने तथा म्यूटेशन होने को रोकने के लिए किया जाने वाला लाकडाउन एक बहुत स्वअनुशासित व सतर्कता वाली क्रिया है। इसमें हमारा यह प्रयास हमेशा हर पल रहता है कि न तो हम संक्रमित हों, यदि किसी कारण से हम संक्रमित हो जाते हैं तो हम दूसरों को संक्रमित नहीं करें।
इसके लिए हमें बहुत सारी बातों का ध्यान रखना पड़ता है। हमें यह पक्का मालूम होना चाहिए कि हम जिस घर या घर के अलग भाग में रह रहे हैं उस घर में कोई भी Covid-19 से संक्रमित नहीं है। क्योंकि यदि कोई भी संक्रमित है तो हम उसके द्वारा संक्रमित होंगे ही और घर के दूसरे लोगों को भी करेंगे।
हम यदि जीवन से जुड़ी जरूरतों के लिए भी यदि घर से बाहर निकल रहे हैं तो हमारी एक चूक या तो हमें संक्रमित कर सकती है या हमारे द्वारा किसी और को संक्रमित कर सकती है। मैं इन संदर्भ में अपनी बात को कुछ उदाहरणों के द्वारा रख रहा हूं, आप इसी तरह के अनेक उदाहरण स्वयं से अंदाजा लगाते हुए समझ सकते हैं —
मान लीजिए आप घर से बाहर निकलते हैं और सब्जी वाले, दूध वाले, फल वाले, किराना स्टोर जाते हैं तो आपके पहले यदि किसी Covid-19 संक्रमित ने उस दुकानदार से कोई सामान लिया हो और यदि उस दुकान का काउंटर या दुकानदार का हाथ या दुकान की कोई वस्तु छुई हो, और उसके कुछ घंटे बाद आप उस वस्तु को या काउंटर को या दुकानदार के हाथ को छूते हैं तो आपके Covid-19 संक्रमित होने की संभावना हो जाती है। दुकानदार के भी संक्रमित होने की संभावना रहती है। ऐसे ही श्रंखला चलती व फैलती रहती है।
मान लीजिए आप घर से बाहर निकलते हैं, आपको पुलिस रोकती है और आपकी लाठी से पिटाई करती है। यदि उस लाठी से आपको पीटने के पहले पुलिस ने जिस व्यक्ति को पीटा था यदि वह Covid-19 संक्रमित है तो उस लाठी द्वारा आपको पीटे जाने से आपके संक्रमित होने की संभावना हो जाती है। क्योंकि लाठी की चोट सहलाने के लिए आप पिटाई वाले स्थान पर (जहां Covid-19 वायरस है) हाथ लगाएंगे, फिर आंखो के आंसू पोछने या किसी कारण से मुंह या नाक में हाथ लगाएंगे तो आप भी Covid-19 संक्रमित हो जाएंगे।
मान लीजिए आप घर से बाहर निकलते हैं और पुलिस आपकी मोटरसाइकिल या कार रोकती है, आपकी कार या मोटरसाइकिल की चाभी छूती है या आपके गालों या शरीर पर कहीं मारती है, तो भले ही पुलिस ने दस्ताने पहन रखे हों लेकिन यदि पुलिस ने आपकी पिटाई के कुछ घंटे पहले भी किसी ऐसे व्यक्ति की पिटाई की है या उसकी गाड़ी की चाभी छुई है जो Covid-19 से संक्रमित हो तो पुलिस की इन गतिविधियों से आपके Covid-19 संक्रमित होने की संभावना हो जाती है। इस घटना में विषाणु के संवहन में दस्ताना माध्यम का काम करता है।
Covid-19 के बारे में कुछ बाते हमें बिलकुल नहीं भूलना चाहिए कि Covid-19 संक्रमण के लक्षण भले ही 14 दिनों में दिखना शुरू हों लेकिन Covid-19 वायरस पहले दिन से ही दूसरों को संक्रमित कर रहा होता है। बहुत लोगों में Covid-19 से संक्रमित होने के बावजूद संक्रमण के लक्षण नहीं दिखाई पड़ते हैं। लक्षण भले ही न दिखाई पड़े लेकिन संक्रमित व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों को संक्रमित कर रहा होता है।
भारत में हुआ लाकडाउन बेहद खतरनाक था
लाकडाउन इसलिए होता है ताकि लोग संक्रमित मनुष्य या संक्रमित वस्तु के संपर्क में आने से बचें। लेकिन यदि संक्रमित मनुष्यों की छटनी नहीं होगी तो संक्रमण की प्रक्रिया चलती ही रहेगी। जिनको संक्रमण नहीं हुआ है, उनको आज नहीं कल होगा ही। जो संक्रमण से ठीक हो चुके हैं, उनको फिर से होगा। क्योंकि जो संक्रमित है वह अपने साथ रह रहे या संपर्क में आने वाले दूसरे लोगों को भी संक्रमित कर देता है। Covid-19 वायरस के साथ समस्या यह है कि बहुत लोगों में संक्रमण के बावजूद लक्षण नहीं दीखते हैं। बहुत लोगों में कुछ दिनों बाद लक्षण दीखते हैं। लेकिन ये लोग उसी पल से ही संक्रमण का वाहक बन रहे होते हैं, जिस पल से उनके शरीर में किसी वस्तु या मानव के संपर्क में आने के बाद Covid-19 वायरस प्रवेश करता है।
एक शरीर से दूसरे शरीर में संवहन करते रहने से Covid-19 वायरस को म्यूटेशन के अवसर मिलते हैं, परिणामतः यह वायरस समय के साथ बहुत अधिक खतरनाक होता चला जाता है।
इसीलिए Covid-19 के लिए टेस्टिंग तथा ट्रेसिंग सबसे अहम तत्व होते हैं। लगातार ट्रेसिंग व टेस्टिंग होने से कम्युनिटी टु कम्युनिटी फैलाव से बचा जा सकता है, विलंबित किया जा सकता है, कम्यनिटी ट्रांसमिशन को नियंत्रित किया जा सकता है। साथ ही लोगों को जागरूक किया जा सकता है। लोगों को मानसिक रूप से लाकडाउन जैसी स्थितियों के लिए तैयार किया जा सके ताकि लाकडाउन से लोगों को असुविधा न हो, हड़बड़ी न हो, घबड़ाहट न हो या कम से कम हो।
भारत में लाकडाउन लगाने की शैली बहुत ही अधिक गलत थी। यही कारण है कि न तो Covid-19 वायरस का संक्रमण नियंत्रित हुआ उल्टे यह वायरस म्यूटेशन करते हुए और खतरनाक हो गया। इसके अलावा देश के लोगों को इतनी अधिक असुविधा हुई कि उनको लगने लगा कि लाकडाउन से बेहतर Covid-19 वायरस से संक्रमित हो जाना है। लोगों ने Covid-19 वायरस के बारे में यह मानना शुरू कर दिया कि यह फर्जी वायरस है, उद्योगपतियों व दवा कंपनियों इत्यादि का षणयंत्र है, ऐसा ही बहुत कुछ।
लेकिन यदि सरकार ने लोगों की नौकरियां जाने को देखते हुए, लोगों के व्यापारों में घाटे को देखते हुए, लोगों के जीवन में खतरे को देखते हुए, लोगों के रोजमर्रा के जीवन में आवश्यक वस्तुओं की जरूरतों को देखते हुए अचानक लाकडाउन करने की बजाय लोगों को असुविधा कम से कम हो, जैसा प्रबंधन करते हुए लाकडाउन किया होता। लोगों को सीधे आर्थिक सहयोग किया होता। सरकार के पास पैसा तो लोगों से ही आता है, देश की GDP तो देश के लोग ही पैदा करते हैं।
यदि लोगों का ही पैसा, ऐसी विरली ऐतिहासिक परिस्थितियों में लोगों के ही काम आ जाता तो देश का विकास ही होता, देश की इकोनोमी डूबने से बच जाती। लेकिन यह बात समझने के पहले यह समझना होगा कि देश की इकोनोमी आम लोगों की इकोनोमी से बनती है न कि उद्योगपतियों की इकोनोमी से। लोग हैं तो ही उद्योग हैं तो ही उद्योगपति हैं।
हमारे पास विरला ऐतिहासिक अवसर था जिससे हम खुद को ही यह साबित कर पाते कि हमें लोकतंत्र की गहरी समझ भले ही न हो लेकिन लोकतंत्र के ABCD की तो समझ है ही। हमारी नौकरशाही के पास भी विरला ऐतिहासिक अवसर था जिससे वह यह साबित कर पाती कि योग्यता का फर्जी प्रोपागंडा के अलावा वास्तव में भी कुछ योग्यता तो है ही।
लाकडाउन के संदर्भ में सबसे मूल बात यह है कि यदि लाकडाउन में संक्रमित लोगों को बाकी लोगों से अलग नहीं किया गया तो लाकडाउन बैकफायर कर जाता है। संक्रमित लोगों की पहचान करनी पड़ती है ताकि वे दूसरे लोगों तक संक्रमण पहुंचाने में वाहक न बनें। इसके लिए ट्रेसिंग व टेस्टिंग लाकडाउन के लिए सबसे जरूरी तत्व होते हैं।
चलते-चलते
हमने Covid-19 के संदर्भ में लगातार भयंकर गलतियां की हैं। अनेक गलतियां हमारी मूर्खता के कारण हुईं तो अनेक गलतियों के लिए हमारे अंदर की कुंठाएं दोषी हैं। दुख की बात यह है कि हम लोग अब भी गलतियां दोहरा रहे हैं। जबकि अब हम लोगों के पास चेतने के अलावा और कोई चारा नहीं है। हम अब भी प्रोपागंडों में लिप्त हैं, हम अब भी अपने अंदर की कुंठाओं द्वारा नियंत्रित हो रहे हैं।
बयानबाजी कुछ भी हो। प्रोपागंडा कुछ भी हो। भले ही कितने ही सूक्ष्म झूठ व भ्रम स्थापित किए जा रहे हों, लेकिन सच यही है कि अपने देश की स्थिति बहुत-बहुत ही अधिक बदतर है। हम अब भी गंभीर नहीं हो रहे हैं। हम अब भी ईमानदार, जवाबदेह, संवेदनशील नहीं हो पा रहे हैं।
हममें से अब भी बहुत लोग इम्युनिटी के मिथक के दंभ में जी रहे हैं। बिना सोचे विचारे बयानबाजी करते रहते हैं, इन लोगों में बहुत सारे डाक्टर लोग भी हैं। यदि वायरस विभिन्न संस्करणों में विकसित होता रहेगा तो इम्युनिटी ही नहीं, सभी प्रकार का दंभ कूड़ेदान में पड़ा मिलेगा।
अब ऐसी स्थिति आ चुकी है कि Covid-19 को किसी भी कीमत पर विकसित होकर अगले संस्करणों में परिवर्तित होने से रोकना चाहिए ताकि उसकी और अधिक खतरनाक होने की निरंतरता पर अवरोध लगे। यह केवल और केवल तब ही संभव है जब हम इस वायरस के एक शरीर से दूसरे शरीर में संवहन को पूरी तरह से रोक दें। ध्यान रहे कि यह वायरस बिना लक्षणों वाले संक्रमित लोगों के द्वारा भी संवहन करता है। बहुत लोग जिनकी रिपोर्ट निगेटिव आती है लेकिन उनके अंदर भी यह वायरस बना रहता है। इसलिए हमें बिना चूक किए हुए इस वायरस से लड़ते रहना है।
हमें बहुत ही अधिक सतर्क, जागरूक, चेतनशील, दूरदर्शी, ईमानदार, जवाबदेह, दृढ़-निश्चयी व गंभीर होने की जरूरत है। यदि अपने लोगों व स्वयं को सुरक्षित रखना है तो हमें ऐसा होना ही होगा।
May 10, 2021 @ 1:26 pm
बहुत ही अच्छा और व्यवहारिक लेख है ,,,ऐसा लगता है कि ये लेख हर गली मोहल्ले हर सरकारी तंत्र तक पहुचे और वो लोग इससे सबक ले ।तभी इस आपदा से बचा जा सकेगा ।
May 11, 2021 @ 12:54 am
धन्यवाद
May 11, 2021 @ 2:35 am
Very informative and lohical. I am in bhagalpur, Bihar. All doctors have closed their private clinic. No government regulation.
May 11, 2021 @ 4:23 am
जिस समय देश के लोगों को गवर्नेंस की सबसे अधिक जरूरत है, उस समय गवर्नेंस गायब है। क्योंकि भारतीय समाज में गवर्नेस का मतलब आम लोगों पर शासन करना माना जाता है।
May 11, 2021 @ 12:27 pm
बहुत बढ़िया पोस्ट। शेयर कर रहा हूँ। भारत की स्तिथि बहुत बिकट और दर्दनाक है।कैसे बयां करूँ कुछ समझ नही आ रहा..
May 11, 2021 @ 11:59 pm
धन्यवाद
May 11, 2021 @ 3:05 am
*Yah lekh Bahut hi upyogi va samayik hai!
*Kewal un logon ke liye upyogi hai jo swayam, Apno, apni community, Desh va Duniyan ke prati Samvedansheel hain!
*Aise log, Jo Apne Jeevan ko Sarthak roop se jeene layak banane ke liye va Samvedanshilta ke sath, Apni aur samajik chetna ke vikas ke liye Nirantar Prayatnsheel hain!
*Boh log, Jo is COVID-19 se paida MAHAMARI se kisi bhi roop me Prabhavit hain ya prabhavit hone ki sambhavna ke ghere mei hain!
May 11, 2021 @ 4:21 am
धन्यवाद
May 11, 2021 @ 3:47 am
बहुत ही अच्छा जानकारी से भरपूर लेख है, यह अधिक लोगों तक पहुंचे विशेषकर सत्ताधारियों, नौकरशाहों, पुलिस प्रशासन सभी तक। बधाई शुभकामनाएं मुबारक हो आशीर्वाद। आप बहुत अच्छी मेहनत करके लिखते हैं। सादर जय जगत।
रमेश चंद शर्मा
May 11, 2021 @ 4:21 am
धन्यवाद
May 11, 2021 @ 6:25 am
Bahut shukriya vivek sir. zabardasti ke mithako se hame awgat karane ke liye.
May 11, 2021 @ 9:25 am
जर्रानवाजी का शुक्रिया
May 11, 2021 @ 7:44 am
बहुत बहुत शुक्रिया दादा।🙏🌱🌱🙏
May 11, 2021 @ 9:25 am
🙏🌹🙏
May 11, 2021 @ 12:10 pm
बहुत ही तथ्यपरक, खोजपूर्ण और वास्तविकता से पूर्ण लेख। लेकिन चूंकि अभी भी लोग मूर्खताएं, दम्भ और आंकड़ों की बाजीगरी नहीं छोड़ना चाहते इसलिए बड़ी निराशा की स्थिति है। 1918 से ज्यादा भयावह स्थिति होने वाली है लेकिन नेता, नौकरशाह और पब्लिक कोई भी होश में आने को तैयार नहीं है।
May 11, 2021 @ 11:59 pm
भयावह है, दुखद है
May 12, 2021 @ 2:38 pm
जबरदस्त, आसान शब्दों में सब खोल कर रख दिया अगर एक शब्द में कहें तो “सम्पूर्ण लेख”
May 13, 2021 @ 12:49 pm
जर्रानवाजी का शुक्रिया