विश्वरंजन, पूर्व पुलिस महानिदेशक छत्तीसगढ़ (भारत से यादें)

प्रस्तावना

डिग्री तथा नौकरी पेशा के चक्कर में पढ़ी जाने वाली किताबों के अध्ययन को मैं स्वाध्याय नहीं मानता क्योंकि इस अध्ययन का गंभीर ठोस समाधानात्मक व जीवन समझ स्तर नहीं होता, जीवन के प्रति समझ नहीं विकसित होती, अधिकतर किताबें तो मजबूरी में रटकर नंबर पाने, डिग्री पाने, नौकरी पाने व नौकरी बनाए रखने जैसे सतही मकसद से पढ़ी जाती हैं। जोड़-तोड़ करके खिचड़ीनुमा किताब लिखने के लिए पढ़ी गई किताबों को भी मैं स्वाध्याय की श्रेणी में नहीं रखता। शोध पत्र प्रकाशित करने की प्रक्रिया में पढ़ी जाने वाली किताबों को भी मैं स्वाध्याय की श्रेणी में नहीं रखता। विद्यालय व यूनिवर्सिटी इत्यादि में छात्रों को पढ़ाने की प्रक्रिया के लिए पढ़ी जाने वाली किताबों को मैं स्वाध्याय की श्रेणी में नहीं रखता। आप समझ सकते हैं कि मैं स्वाध्याय किसे कहता हूं।

मैं अपने जीवन में अधिक स्वाध्याय नहीं कर पाया हूं, फिर भी 32-33 वर्ष की आयु तक लगभग 40000 (चालीस हजार) किताबों का अध्ययन मैं कर चुका था, 22 वर्ष की आयु तक कई छोटे, मंझोले व बड़े पुस्तकालयों की हजारों किताबों को पढ़ चुका था। घंटो-घंटो पुस्तकालयों में जाकर पढ़ना, घर में किताबें लाकर रात-रात भर बिना सोए किताबें पढ़ते रहना, मेरी नियमित दिनचर्या का सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण हिस्सा था।

जीवन, समाज, व्यवस्था, मनोविज्ञान, समाज-मनोविज्ञान, सामाजिक-समाधान तथा कंडीशनिंग को पहचानने, जानने, समझने इत्यादि की ईमानदार व जबरदस्त भूख ने मुझे वर्षों तक प्रतिदिन लगभग 20-20 घंटे किताबें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। शरीर ऐसा ढला कि मैं आज भी बहुत कम सोता हूं। किताबें पढ़ना, जमीन पर सीधा समाज के साथ विभिन्न प्रकार के प्रयोग करना, करते हुए सीखना जानना समझना, गंभीर व समझ रखने वाले लोगों से चर्चाएं करना इत्यादि-इत्यादि स्वाध्याय व जीवंत-स्वाध्याय के विभिन्न आयाम हैं। मुझे तलाश रहती है कि गंभीर स्वाध्यायी लोगों से मित्रता हो, चर्चाएं हों, जानना समझना हो।

अस्तित्व की कृपा रही कि योरप, अमेरिका, रूस, जापान इत्यादि देशों की नामचीन यूनिवर्सिटीज के सैकड़ों शोधार्थियों, प्रोफेसरों, चिंतकों, लेखकों, विचारकों से समय के साथ-साथ मित्रताएं हुई, चर्चाएं होती रहती हैं, अध्ययन का आदान-प्रदान होता रहता है।

दुख यही है कि जिस भारत देश में मैं पैदा हुआ, पला, बड़ा हुआ, उस समाज के लोगों में गंभीर स्वाध्यायी लोगों की जमात बहुत बड़ी नहीं है, स्वाध्याय के प्रति रुचि नहीं है। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कुछ किताबें पढ़ने को स्वाध्याय मान लिया जाता है, यदि प्रतियोगी परीक्षाएं पास करके नौकरी प्राप्त कर ली ऊपर से यदि सामंत बनने वाली नौकरी प्राप्त कर ली तो फिर कहने की क्या, खुद को दुनिया का सबसे विद्वान मानने के अहंकार में जीना शुरू कर देते हैं। अधिकतर बौद्धिक लोग फसे हुए रहते हैं। इसलिए गंभीर चर्चाएं सहजता से कर पाना संभव नहीं हो पाता।

विश्व रंजन दा भारत में उन बहुत कम लोगों में से हैं, जिनसे मिलने व चर्चाएं करने में मुझे आनंद आता रहा है। भारत में होता तो पिछले चार वर्षों में लंबी चर्चाओं के कई दौर और हो चुके होते।

विश्व रंजन

विश्व रंजन दा के साथ बस्तर का आदिवासी समाज, माओवाद व समाधान इत्यादि पर लंबी चर्चाएं करने में हमेशा बहुत आनंद आया। स्वाध्यायी हैं और विजनरी चिंतक हैं। सामाजिक मसलों में प्रोफेशनल व प्रैक्टिकल अप्रोच से चर्चा करते हैं। हजारों किताबों का अध्ययन कर चुके हैं। आज भी प्रतिदिन अधिकतर समय पढ़ने व लिखने में ही गुजारते हैं। इनका घर किताबों से ठूंस-ठूंस कर भरा रहता है। बस्तर, माओवाद, समाधान व विकास आदि पर गंभीर चर्चा हुई। थियरी से प्रैक्टिकल तक माओवाद को गहरे से समझने वाले इंसान।

विश्व रंजन जी 1973 बैच के IPS, 2007 में छत्तीसगढ़ राज्य के महानिदेशक बने, चार वर्षों से अधिक समय तक महानिदेशक रहे। जानीमानी हस्ती फिराक गोरखपुरी के नाती हैं। सन् 1973 में कम ज्यादा लगभग 21 वर्ष की आयु में IPS बन गए थे। यूनिवर्सिटी डिग्री में सिर्फ BA हैं लेकिन पूरा जीवन जबरदस्त स्वाध्याय करते रहे आज भी करते हैं।

विश्वा दा के साथ मेरा पहला संवाद 2009 की शुरुआत में हुआ था। पहली लंबी चर्चा 2011 में हुई थी। पहली लंबी चर्चा की घटना भी दिलचस्प है। मैं यह सोच कर गया था कि इतना बड़ा अधिकारी है, कुछ मिनटों की ही चर्चा होगी। मैं अधिक से अधिक 15 मिनट की बातचीत का अनुमान करके गया था, लेकिन बातचीत कई घंटे चलती रही। 
इनके ओएसडी साहब सरकारी आवास के गार्ड लोगों को जानकारी देना भूल गए होंगे, नतीजा यह कि मुझे गेट पर ही रोक लिया गया, मेरी बात सुनने को तैयार नहीं। तब मैंने विश्वा दा के मोबाइल पर काल किया, उसके बाद तो जो गार्ड मना कर रहे थे वही लोग बहुत सम्मान के साथ अंदर तक छोड़ने गए। विश्वा दा की विनम्रता यह कि रात में चर्चा खतम होने पर दरवाजे तक छोड़ने आए। उस दिन मैंने उनके साथ इतनी काफी पी व स्नैक खाए थे कि पेट यूं ही जबरदस्त भर गया था।

पहली लंबी चर्चा के समय की फोटो

2016 में भारत से ऑस्ट्रेलिया आने के पहले मैं जिन लोगों से मिलना चाहता था, उनमें से विश्वा दा भी थे। क्योंकि इस बार का ऑस्ट्रेलिया आना पहले जैसा नहीं था, मुझे नहीं मालूम था कि भारत की यात्रा भविष्य में कब हो पाएगी। मुझे नहीं पता था कि पिता बनने के बाद मैं जमीनी सामाजिक गतिविधियों को जमीन पर रहकर सशरीर कब और कितना समय दे पाऊंगा। स्थितियां ऐसी बनीं कि यह लेख लिखने तक कुछ दिन कम चार वर्ष हो चुके हैं, एक बार भी भारत जाना नहीं हो पाया है। अब तो COVID-19 के कारण एक देश से दूसरे देश की यात्रा करने की स्थितियां बहुत ही अधिक बदल चुकी हैं, इसलिए अनुमान नहीं कि अब भारत की यात्रा भविष्य में कब और कितने समय के लिए संभव हो पाएगी।

मेरी इच्छा थी कि मैं विश्वा दा को कैनबरा आमंत्रित करता, लेकिन पिता बनने के बाद स्थितियां कुछ ऐसी रहीं कि आमंत्रित करना तो दूर, कई किताबें पूरी नहीं कर पाया हूं जबकि कोई आधी, कोई चौथाई, कोई तीन-चौथाई पूर्ण हो चुकी है।

विश्वा दा मेरी एक किताब के साथ

मैं विश्वा दा के साथ होने वाली लंबी चर्चाओं व मुद्दों पर उनकी गहरी समझ के अतिरिक्त उनकी ईमानदार स्वीकारोक्ति के लिए भी आदर करता हूं। चार वर्षों से अधिक समय तक छत्तीसगढ़ राज्य के महानिदेशक मतलब राज्य के सर्वोच्च नौकरशाहों में से रह चुके विश्वा दा की ईमानदार स्वीकरोक्ति यह है — विश्वा दा कहते हैं, कि

"भारत का 95% से अधिक नौकरशाह गंभीर स्वाध्याय नहीं करता, निरंतर स्वाध्याय नहीं करता, मुद्दों को समझने के लिए स्वाध्याय-शोध नहीं करता। जिसके कारण नौकरशाह का विकास नहीं हो पाता। इसीलिए सामाजिक मुद्दों के लिए उपयुक्त नीतियों का निर्माण नहीं कर पाता। नौकरशाह होने का सामंती अहंकार सोच, समझ व दृष्टि में बिगाड़ और करता रहता है।"

ऐसी बात वही व्यक्ति विचार कर सकता है, जिसमें तत्वों को देखने समझने की दृष्टि होती है।