फोटो-लेख :: आदि का प्रि-स्कूल — शोध कार्य, इनडोर, आउटडोर
आदि का प्रिस्कूल तीन वर्ष से लगभग साढ़े पांच वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए है। स्कूल शब्द से भ्रम में आने की जरूरत नहीं है। आदि के लिए स्कूल जाने के लिए एक भी किताब, एक भी कापी, एक भी पेंसिल, एक भी पेन, एक भी रबड़, एक भी कागज इत्यादि न तो खरीदा गया है, न ही आदि यह सब लाद कर स्कूल जाते हैं। आदि के पिठ्ठू-झोले, जिसे मैं या आदि की अम्मा ही लादकर ले जाते हैं और लादकर वापस लाते हैं, में एक बहुत मुलायम तकिया, एक चादर, एक मुलायम दरी, पानी की बोतल व खाने की सामग्री रहती है। आदि की इच्छा हो तो आदि स्कूल में अपनी दरी बिछाकर, तकिया लगाकर चादर ओढ़ कर धड़ल्ले से नींद ले सकते हैं।
न न, यह चाइल्ड-केयर या डे-केयर नहीं है। यह प्रि-स्कूल ही है। इस प्रि-स्कूल में उन्हीं बच्चों का प्रवेश होता है, जो आत्मनिर्भर होते हैं। आत्मनिर्भर मतलब अपने कपड़े व जूते इत्यादि उतारना व पहनना जानते हैं। टट्टी-पेशाब महसूस करने से लेकर हाथ धोने तक सबकुछ बिना किसी के सहयोग के स्वयं सफलता पूर्वक कर लेते हैं। अपना सामान संभाल कर रखना जानते हैं, और ऐसा करते हुए व्यवहार में जीते भी हैं।
इस स्कूल में न तो क्लासरूम हैं, न ही ब्लैकबोर्ड, न ही कोई टेक्स्ट-बुक या टेक्स्ट-कापी। बच्चे खुद प्रयोग करते हुए सीखते समझते हैं। शिक्षक बच्चों के साथ शिक्षक के रूप में प्रस्तुत होने की बजाय, बच्चा बनकर प्रस्तुत होता है।
बच्चा अपनी मनचाही गतिविधि कर सकता है, ऐसा भी नहीं है कि बच्चा यदि कोई गतिविधि शुरू करता है तो उसे पूरा करे ही। किसी प्रकार का कोई टेस्ट/परीक्षा नहीं होती। बच्चे को गतिविधि करने से मना नहीं किया जा सकता है। बच्चों की सहमति लेना जरूरी होता है, बिलकुल वैसे ही जैसे किसी वयस्क से सहमति ली जाती है। बच्चे की हर गतिविधि, हर बातचीत का शिक्षक लोग नोट्स बनाते हुए संकलन करते हैं। ऐसा करना शिक्षकों को बच्चे का मनोविज्ञान समझने में मदद करता है, साथ ही यदि स्कूल में नया स्टाफ या शिक्षक आता है, तो उसे भी बच्चे के साथ रिश्ता व तालमेल बनाने में सहयोग मिलता है।
बच्चे शिक्षकों का नाम लेते हैं, बिलकुल वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा एक मित्र दूसरे हमउमर मित्र के साथ करता है। शिक्षक बच्चों को डाँट नहीं सकता है, आंख नहीं दिखा सकता है, चीख-चिल्ला नहीं सकता है। अप्रत्यक्ष रूप से भी बच्चे का अपमान नहीं कर सकता है, हतोत्साहित नहीं कर सकता है। बच्चों को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष किसी भी प्रकार से दंडित या प्रताड़ित या अपमानित या हतोत्साहित नहीं किया जा सकता है।
बच्चों को वयस्कों की ही तरह पूर्ण मनुष्य माना जाता है। दरअसल आयु शरीर के आकार प्रकार के आधार पर अंतर करना नस्लवाद (रेसिज्म) की श्रेणी में आता है, इसलिए बच्चों को उनकी कम आयु, छोटे शरीर इत्यादि के आधार पर कमतर या दोयम मनुष्य मानना नस्लवाद (रेसिज्म) ही है। बच्चों को पूर्ण मनुष्य न मानने की नस्लवादी मानसिकता ही बच्चों में हिंसा, अवहेलना, तिरस्कार व दूसरों को अपने जैसा मनुष्य न मानने की मानसिकताओं का बीज बोती है।
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मैंने भारत में इंजीनियरी से स्नातक करते हुए व स्नातक करने के बाद भारत के विभिन्न इलाकों में विभिन्न आयु वर्ग के बच्चों, किशोरों व वयस्कों के साथ विभिन्न स्तरों पर शिक्षा पर प्रयोग किए। जमीन पर उतर कर विभिन्न आयु-समूहों, विभिन्न सामाजिक-संस्कारों वाले, विभिन्न भौगोलिक-परिस्थितियों व विभिन्न स्तरों पर शिक्षा के प्रयोग करते हुए शिक्षा क्या होनी चाहिए इसकी समझ बनी। मैंने अपने जीवन में कभी डिग्रियों, नौकरी, मुद्रा इत्यादि को प्राथमिकता नहीं दी न ही जीवन का लक्ष्य ही बनाया।
यही कारण रहा कि प्रतिष्ठित योरपीय देशों से पीएचडी करने के अवसरों के रहते हुए भी कभी लाभ नहीं उठाया। प्रतिष्ठानों के मुख्य-संस्थापकों में से होने के बावजूद कभी नाम, पद व धन-लाभ का नहीं सोचा। मैं अपनी संतान को नौकरी व धनार्जन करने तक ही सीमित रहने वाली शिक्षा देने की बजाय, जीवन को समझने, व विश्व को समाधान देने की दिशा वाली शिक्षा देने की इच्छा रखता हूं।
मैं अपनी संतान को जिस तरह की शिक्षा दे पाने के लिए सिडनी जैसे अतिविकसित व अति समृद्ध शहर को छोड़कर ऑस्ट्रेलिया की राष्ट्रीय राजधानी कैनबरा आया था, अभी तक तो आदि को वैसी शिक्षा दे पाने में सफल रहा हूं। आदि जब लगभग पौने दो वर्ष के थे तब जंगल-पहाड़ स्कूल जाते थे, लगभग साढ़े-तीन वर्ष की आयु में इस प्रि-स्कूल में आ गए।
शोध-कार्य
बच्चे विभिन्न प्रकार के शोध करते हुए वस्तुओं की यांत्रिकता समझते हैं। बच्चों को विभिन्न प्रकार के औजारों का प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। तीन साढ़े-तीन साल की आयु के बच्चे भी अपने आपको सुरक्षित रखते हुए कैंची व धारदार औजारों का प्रयोग करना सीखते हैं। विद्युत, मापन, संयुग्मन इत्यादि बहुत कुछ बच्चे करते हुए सीखते हैं। इस प्रि-स्कूल में बच्चों के लिए यांत्रिक प्रयोगशालाएं भी हैं।











आउटडोर
खेलकूद, रस्सी से पेड़ पर चढ़ना, झूला बनाकर झूलना, रेत से शहर बनाना, खेतीबाड़ी इत्यादि बहुत कुछ करते हुए सीखते समझते हैं। गलती करते हुए, आपस में चर्चा करते हुए, सीखते समझते हैं।







इनडोर








June 2, 2020 @ 5:21 am
Saw the photos and read the article to the last T. Aadi is groningen beautifully. The kind of education he is getting is the stuff dreams are made of.
June 2, 2020 @ 5:24 am
धन्यवाद
June 2, 2020 @ 8:43 am
वाकई बेहद खूबसूरत, बिलकुल हमारे आदि बिटवा जैसा
June 2, 2020 @ 8:45 am
धन्यवाद
June 3, 2020 @ 5:40 am
बहुत बहुत खूबसूरत तस्वीरें है, बच्चा कितने उत्साह से इस प्री स्कूल में जाता होगा,इसकी कल्पना ही नही हो सकती है। 😊
December 8, 2021 @ 9:09 am
Beautiful pic
June 3, 2020 @ 2:37 pm
Shaandar
June 2, 2020 @ 11:14 am
असली शिक्षा।
June 4, 2020 @ 8:20 am
जी
June 2, 2020 @ 11:46 pm
It seems very good it’s a different
June 4, 2020 @ 8:20 am
जी रूटीन से अलग ही है
June 3, 2020 @ 3:52 am
अद्भुत! व्यावहारिक, प्रकृति और समाज के साथ समन्वय सिखानेवाली, विचार और चिन्तन की प्रवृत्ति विकसित करनेवाली! बहुत सुन्दर!
June 4, 2020 @ 8:20 am
धन्यवाद
June 3, 2020 @ 9:45 am
सबसे अच्छी बात बच्चे किसी भी तरह तनाव में नहीं आते ,विचारमग्न हो सकते हैं ।बच्चों पर क्रियाकलाप थोपे नहीं जाते,नैसर्गिक रूप से बच्चे सीखते हैं।
शिक्षा के स्वरूप की समझ ऑस्ट्रेलिया में बहुत बेहतर जिम्मेदारीपूर्ण ,मानवीय और व्यवहारिक है। आदि के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं।आपका आभार आदि के स्कूल और गतिविधियों से अवगत कराने के लिए।
June 7, 2020 @ 12:21 am
वाह बहुत ही खूबसूरत,ऐसे स्कूलों से तो बच्चे घर ही न वापस आये।बहुत ही अच्छा माहौल है।
December 8, 2021 @ 8:42 am
शानदार !! पढ़कर अच्छा लगा.
June 14, 2020 @ 10:49 am
इन सबको पढ़ना देखना समझना सब कुछ अद्भुत है। आदि के लिए शुभकामनाएं।
तीन वर्षीय आदि के जीवन की किताब का महत्वपूर्ण अध्याय — अलग तरह का प्रि-स्कूल – Vivek Umrao
July 17, 2021 @ 7:47 am
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